खलवतों का पास रख्खा

ख़लवतों का पास रख्खा उम्र भर ही,
अब मुसलसल बोलना ही चाहते हैं,

थक गए हैं मुट्ठियां भींचे हुए हम,
अब इन्हें बस खोलना ही चाहते हैं,

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