उन्सियत होती नहीं है
उंसियत होती नहीं है अब किन्हीं हालात से,
इतनी नफ़रत हो गई है आदमी की ज़ात से,
हर नए इनसान से अब कोफ़्त होती है हमें,
दब गए हैं इस क़दर हम दर्द की इफ़रात से,
इक नए अंदाज़ से आकर गले मिलते भी हैं,
पर सभी किरदार हैं इक तीरगी की रात से,
उर्मिला माधव..
Comments
Post a Comment