कुछ और करें
हम तिरे ग़म से उबर जाएं तो कुछ और करें,
तेरे ज़ीने से उतर जाएं तो कुछ और करें,
अब ये तक़दीर कहीं और अगर ले जाए,
इससे पहले ही न मर जाएं तो कुछ और करें,
अब तो नश्शे में हुए ग़र्क़ हमें होश कहाँ
रंगे उल्फ़त से जो डर जाएं तो कुछ और करें,
सारी दुनिया से बहुत अच्छा भटक लेते हैं,
इस जुनूं में भी जो घर जाएं तो कुछ और करें,
अपनी ख़ाहिश है, जहां भर से अलग चलने की,
न किसी दर पा अगर जाएं तो कुछ और करें..
उर्मिला माधव
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