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Showing posts from May, 2024

रौशनी का आलम है

नींद आँखों में आये जाती है, मुझ पै बस मुस्कुराये जाती है, हर तरफ रौशनी का है आलम, तीरगी मुझ पै छाये जाती है, हूक उठती है दिल में रह-रह के, मुझ को बेजा दुखाये जाती है, अपने आपे में ही नहीं शायद, एक जोगन जो गाये जाती है, पर्दा दारी है बंद पलकों की, इनमें दुनिया समाये जाती है, सदियों पहले की कोई आहट सी, क्यूं सितम मुझपे ढाये जाती है, ख़ूबरू था कभी जो रंग-ए-हिना, फिर वो खुशबू सी आये जाती है कोई तो होश में ले आओ मुझे, बेख़ुदी मुझ को खाये जाती है... #उर्मिलामाधव..

ज़िद है

हमें ख़ुद को ख़ुद आज़माने की ज़िद है, जहाँ को अक़ीदत जताने की ज़िद है, ब दम टूट सकते हैं मरने की हद तक, ये कूव्वत जहाँ को  दिखाने की ज़िद है, मुहब्बत में झुकना,झुकाना अबस ही, ये अहमक चलन है,बताने की ज़िद है, अगर हमसे उल्फ़त है आजाओ ख़ुद ही, हमें भी, तुम्हें, नईं बुलाने की ज़िद है, जुदा रंग अपना ज़माने के रंग से, कि ताहद इसे बस निभाने की ज़िद है... वजूहात इसके नहीं ख़ास कुछ भी, हमें अपनी ज़िद बस निभाने की ज़िद है... उर्मिला माधव ...

हलाल करते हैं

ख़ुद को शायर तो सब समझते हैं, सच को कहने से...साफ़ बचते हैं, बात लिखते भी हैं मुहब्बत की, उसपे हाथों से मुंह को ढकते हैं, अब कहो ये भी कोई बात हुई, दिल में तूफां हसद का रखते हैं, रु-ब-रु कोई जो कहे आकर, अपनी नज़रों से बगलें तकते हैं, जब भी मीज़ान पर वफ़ा तौली, उस घड़ी कुफ़्र ही तो बकते हैं, ख़ुद को ज़ाहिर करेंगे शाहाना , देखिये इनको जब बहकते हैं, इनकी कमज़ोरियों पे कुछ भी कहें, तब ये अंगार से दहकते हैं.... उर्मिला माधव...

तकते हैं

ख़ुद को शायर तो सब समझते हैं, सच को कहने से...साफ़ बचते हैं, बात लिखते भी हैं मुहब्बत की, उसपे हाथों से मुंह को ढकते हैं, अब कहो ये भी कोई बात हुई, दिल में तूफां हसद का रखते हैं, रु-ब-रु कोई जो कहे आकर, अपनी नज़रों से बगलें तकते हैं, जब भी मीज़ान पर वफ़ा तौली, उस घड़ी कुफ़्र ही तो बकते हैं, ख़ुद को ज़ाहिर करेंगे शाहाना , देखिये इनको जब बहकते हैं, इनकी कमज़ोरियों पे कुछ भी कहें, तब ये अंगार से दहकते हैं.... उर्मिला माधव...

उसको चाहा नहीं

बग़ैर मतले की एक ग़ज़ल--- हर सदा का मिरी उसको एजाज़ था, फ़िर भी उसने कभी मुड़के देखा नहीं, उसको अंदाज़ा था मेरी तक़लीफ़ का, वो जो उम्मीद थी उस को तोड़ा नहीं, फ़िर कलेजे पे ग़म की परत जम गई, मुझको ख़ामोशियों ने झिंझोड़ा नहीं, वो यूँ ही रोज़ आता ऑ जाता रहा, मुझको ज़िद सी रही उसको टोका नहीं, मुझको वीरानियों ने रुलाया बहुत, रिश्ते बोसीदा थे, फ़िर भी छोड़ा नहीं, अपनी चाहत में उसको रखा तो मगर, ऐसे जैसे कभी उसको चाहा नहीं, उर्मिला माधव

हया कीजिये

थोड़ा परदा किया कीजिये, तौबा-तौबा हया कीजिये, हम हैं ख्वाहिश अगर आपकी, दिल पै दस्तक दिया कीजिये, हैं अदीबों की हम ज़ात में, कुछ क़दम हौसला कीजिये , लोग देंगे भी क्या आपको, हमसे ही इल्तिज़ा कीजिये, मुफ़्त बदनाम होने से क्या, हमको सजदा किया कीजिये, उम्र भर क्या है हमने किया, सबसे चर्चा किया कीजिये, हमने मुड़ के न देखा कभी, आप माने न क्या कीजिये, वक़्त का ये तकाज़ा है अब, अपनी इज़्ज़त बचा लीजिए.. सबकी इज़्ज़त किया कीजिये.. उर्मिला माधव...

बरसात नहीं है

हर इक विदाई होनी है शिकवा किये बग़ैर, बिजली चमक रही है ऑ बरसात नहीं है

ऐश ओ इशरत देख कर

फ़ैसले होते नहीं हैं, सिर्फ़ सूरत देख कर, दिल न जोड़ा जाए हरगिज़, ऐश ओ इशरत देख कर, बुत है, आदमक़द सही, तो पूजना क्यों कर उसे, कुछ न सोचा झुक गया बस अपनी चाहत देख कर, ग़ैर से वाबस्ता रहके, कौन रह पाया है ख़ुश, जो हमेशा ही मिला हो, ज़ाती हसरत देख कर, मुस्कुरा के आ गया तो दिल ही रौशन हो गया, हम पिघल के रह गए इक  ख़ास सीरत देख कर, दिल कुशादा था हमारा, उसके जी की क्या ख़बर, सब समझने लग गए हम उसकी फ़ितरत देख कर, उर्मिला माधव

जिजिविषा

भित्ति चित्रों से उकेरे शब्दअब कुछ, जिजीविषा भी छल रही है जब स्वयं को, जो सवेरे श्वांस में अब तक निहित थे, आ खड़े हैं बेधने अंतर अहम् को, दूर की अब दृष्टि धुंधलाने लगी है, और कब तक ढोयेंगे झूठे भरम को, #उर्मिलामाधव... 19.5.2015...

कह गए

आप सब आलिम हुए सो जाने क्या क्या कह गए, हम बिना तालीम ठहरे, धार के संग बह गए..

क़ाबिल नहीं

जो दिले बिस्मिल के ही क़ाबिल नहीं, वो हमारे दिल के ही क़ाबिल नहीं, किस लिए हम मुन्तज़िर हों वक़्त के, हम कि मुस्तक़बिल के ही क़ाबिल नहीं, तू मसीहा है भी तो किस काम का, ज़िंदगी महमिल के ही क़ाबिल नहीं

मेरा मकान था नज़्म

मेरा मकान था, नक़ब के लिए नहीं, दर-ओ-दीवार सील जाते हैं, नक़ब की चोट से, और तब निकल जाती है दम बुनियादों की, घेरे टूटने का एक दर्द होता है, प्यार का घेरा, इकरार का घेरा, दीदार का घेरा, तुम क्या समझोगे? जज़्बात की दयानतदारी , उम्र भर ढोई है हमने, अपने हिस्से की तनहाई रोई है हमने, तब भी तो तुम नहीं थे, आज भी नहीं हो... और आगे भी नहीं होगे, घर के कोने सूने हैं, और रहेंगे भी, हम यूँ ही उम्र भर सहेंगे भी, याद तो हो तुम हमें, कभी नहीं भुलायेंगे, पर कभी नहीं बुलायेंगे, हमें धीर धरने की आदत है, चाहतों से बगावत है... राहतों से बगावत है... किसकी राह देखना  और क्यूँ ???????????????? ये मेरा मकान था,नक़ब के लिए नहीं... #उर्मिलामाधव... 17.5.2015..

ताक़ीद की

जाने किस-किस ने हमें ताकीद की, क्यूँ नहीं देखी चमक खुर्शीद की ? जबकि एहसास-ए-रक़ाबत होगया, किससे तब उम्मीद हो ताईद की ? सब चमक से ही अगर मंसूब था, सबसे बेहतर थी चमक नाहीद की, वक़्त-ए-मुश्किल हो गए महदूद हम, दिल संभाला,और फ़क़त तौहीद की, ख़ूबसूरत जिंदगी ..............नैरंग है, हमने कब इससे कोई उम्मीद की ? जब तगाफुल का इरादा कर लिया, कौन करता फ़िक्र ख़ैर-ओ-दीद की ? उर्मिला माधव... 17.5.2016.... खुर्शीद--- सूरज  ताईद--- हिमायत, तौहीद---ईश्वर को एक मानना नहीद---- शुक्र का तारा  नैरंग---माया-तिलिस्म

मसकन बनाना है मुझे

रेत पर मसकन बनाना है मुझे, अपने ख़ाबों को सजाना है मुझे, तुम न बसने पाओगे इनमें कभी, क्यूँकि तुमसे दूर जाना है मुझे, कब कहाँ दरकार है कोई समां, ख़ुद ब ख़ुद ही मुस्कुराना है मुझे, हाँ मैं तनहा हूँ मगर ग़ाफ़िल नहीं, हौसले से चलते जाना है मुझे, अब मलक कोई न खाए देखना, इस तरह खिरमन बचाना है मुझे, दिल के तूफ़ानों का मुझको डर नहीं, दिल को ही मदफ़न बनाना है मुझे...  Urmila Madhav. 13.5.2013.

ज़बान रहने दो

बस कि दिल पर निशान रहने दो, थक गए जिस्म जान रहने दो. मुझको वहशत है इस ज़माने से, अब ये ख़ाली मकान रहने दो.. दिल भी आज़ाद, जिंदगानी भी, अब ये सब इम्तहान रहने दो... अपना हिस्सा यहां नहीं बाक़ी, अब ये सारा जहान रहने दो... ये नहीं हो के लोग डर जाएं  सच के मुंह में ज़ुबान रहने दो  उर्मिला माधव - Urmila madhav O

आब ए जमजम है

बस यही ज़िन्दगी का आलम है, जब भी देखो तो आँख पुरनम है, यूँ तो वो दिल में अब भी रहते हैं, फ़र्क़ इतना है,जुस्तजू कम है, या हैं अनजान रस्म-ए-उल्फत से, या नहीं दिल में कोई दम ख़म है, हाँ मुहब्बत है हमने कह तो।दिया, दिल में काबा है,आब-ए-जमजम है, उनके हिम्मत जिगर में है ही नहीं, फिर तो वो कुछ नही,यही गम है... #उर्मिलामाधव... 8.5.2015

ख़ून के रिश्ते जो मेरे नाम थे

खून के रिश्ते जो मेरे नाम थे, ज़िन्दगी के वास्ते इल्ज़ाम थे, हक़ अदा करते रहे रुसवाई का, अश्क़ मेरे जा-ब-जा बदनाम थे, फासलों की बढ़ गयी रस्सा-कशी, जो तग़ाफ़ुल का लिए पैग़ाम थे, था मुहब्बत का जिन्हें दावा बहुत, मुश्किलों के वक़्त वो नाकाम थे, एक तिनका जो मिला सौग़ात में, कीमती था और उसी के दाम थे, आज उसके नाम से जिंदा हूँ मैं, जिसके छोटे हाथ छोटे ग़ाम थे... उर्मिला माधव... 1.4.2014...

पड़ोसियों सी

Ek nazm..  एक नज़्म... कभी जो मुझसे कहे किसी ने, वो लफ़्ज़ अब तक चुभे हुए हैं, कई तो ऐसे भी दर्द हैं जो, अना के लब पर रुके हुए हैं, कभी-कभी ये जी चाहता है, इसे बता दूं,उसे बता दूं, मगर ये अश्क़ों के बोझ मेरी, बरौनियों में छुपे हुए हैं, ये अश्क़ लेकर सरे ज़माना, में फिर रही हूं,मैं हंस रही हूं, वहीं कहीं पर, ग़मों की ज़द में, पड़ोसियों सी मैं बस रही हूं, अगर यही बस शिकस्ता दुनियां, जो दुश्मनों सी खड़ी हुई है, नसीब में है,क़रीब में है, के पीटती है लकीर दुनियां, मेरी नज़र में हकीर दुनियां, मेरे बराबर से चल रही है, हर इक क़दम पर उछल रही है, उछल रही है,मचल रही है, हवा से आगे निकल रही है, लो मुझको देखो,अकेली होकर, भी मेरी दुनियां संभल रही है, जहां का नक्शा बदल रही है, बदल रही है,बदल ही देगी... उर्मिला माधव. 8.5.2017

छोटे कपड़े

आपके वस्त्र बहुत सुंदर हैं, किन्तु कुछ छोटे हैं, संभवतः कपड़े की तंगी रही होगी, या अधिक मंहगा होगा अन्यथा आप अत्यंत सुंदर हैं कपड़े की तंगी आपके मुखारविन्द तक  पहुंचने नहीं देती, संभवतः दर्पण कुछ नहीं कह पाया होगा आपसे आप को कपड़े की खींचतान ने व्यस्त रखा होगा समय मिले तो दर्पण ज़रूर देखना आप अत्यंत सुंदर हैं उर्मिला माधव

बड़े हैं तो?

आप उहदे में कुछ बड़े हैं तो ? ख़ास मंज़िल पै ही खड़े हैं तो? गोया तकदीर के सिकंदर हों, पर भी सुरख़ाब के जड़े हैं तो ? हम न माने हैं,और न मानेंगे, अब अगर जिद पै ही अड़े हैं तो ? कैसे-कैसे गुनाहगारों से, उम्र भर हम भी जब लड़े हैं तो ? उर्मिला माधव
दिल अगर ज़िद्दी भी हो तो इसकी क्या तक़दीर है, ख़ून दिल का हो रहा है बस यही तशहीर है,