रौशनी का आलम है
नींद आँखों में आये जाती है, मुझ पै बस मुस्कुराये जाती है, हर तरफ रौशनी का है आलम, तीरगी मुझ पै छाये जाती है, हूक उठती है दिल में रह-रह के, मुझ को बेजा दुखाये जाती है, अपने आपे में ही नहीं शायद, एक जोगन जो गाये जाती है, पर्दा दारी है बंद पलकों की, इनमें दुनिया समाये जाती है, सदियों पहले की कोई आहट सी, क्यूं सितम मुझपे ढाये जाती है, ख़ूबरू था कभी जो रंग-ए-हिना, फिर वो खुशबू सी आये जाती है कोई तो होश में ले आओ मुझे, बेख़ुदी मुझ को खाये जाती है... #उर्मिलामाधव..