उसको चाहा नहीं
बग़ैर मतले की एक ग़ज़ल---
हर सदा का मिरी उसको एजाज़ था,
फ़िर भी उसने कभी मुड़के देखा नहीं,
उसको अंदाज़ा था मेरी तक़लीफ़ का,
वो जो उम्मीद थी उस को तोड़ा नहीं,
फ़िर कलेजे पे ग़म की परत जम गई,
मुझको ख़ामोशियों ने झिंझोड़ा नहीं,
वो यूँ ही रोज़ आता ऑ जाता रहा,
मुझको ज़िद सी रही उसको टोका नहीं,
मुझको वीरानियों ने रुलाया बहुत,
रिश्ते बोसीदा थे, फ़िर भी छोड़ा नहीं,
अपनी चाहत में उसको रखा तो मगर,
ऐसे जैसे कभी उसको चाहा नहीं,
उर्मिला माधव
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