मेरा मकान था नज़्म
मेरा मकान था,
नक़ब के लिए नहीं,
दर-ओ-दीवार सील जाते हैं,
नक़ब की चोट से,
और तब निकल जाती है दम बुनियादों की,
घेरे टूटने का एक दर्द होता है,
प्यार का घेरा,
इकरार का घेरा,
दीदार का घेरा,
तुम क्या समझोगे?
जज़्बात की दयानतदारी ,
उम्र भर ढोई है हमने,
अपने हिस्से की तनहाई रोई है हमने,
तब भी तो तुम नहीं थे,
आज भी नहीं हो...
और आगे भी नहीं होगे,
घर के कोने सूने हैं,
और रहेंगे भी,
हम यूँ ही उम्र भर सहेंगे भी,
याद तो हो तुम हमें,
कभी नहीं भुलायेंगे,
पर कभी नहीं बुलायेंगे,
हमें धीर धरने की आदत है,
चाहतों से बगावत है...
राहतों से बगावत है...
किसकी राह देखना
और क्यूँ ????????????????
ये मेरा मकान था,नक़ब के लिए नहीं...
#उर्मिलामाधव...
17.5.2015..
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