पड़ोसियों सी
Ek nazm..
एक नज़्म...
कभी जो मुझसे कहे किसी ने,
वो लफ़्ज़ अब तक चुभे हुए हैं,
कई तो ऐसे भी दर्द हैं जो,
अना के लब पर रुके हुए हैं,
कभी-कभी ये जी चाहता है,
इसे बता दूं,उसे बता दूं,
मगर ये अश्क़ों के बोझ मेरी,
बरौनियों में छुपे हुए हैं,
ये अश्क़ लेकर सरे ज़माना,
में फिर रही हूं,मैं हंस रही हूं,
वहीं कहीं पर, ग़मों की ज़द में,
पड़ोसियों सी मैं बस रही हूं,
अगर यही बस शिकस्ता दुनियां,
जो दुश्मनों सी खड़ी हुई है,
नसीब में है,क़रीब में है,
के पीटती है लकीर दुनियां,
मेरी नज़र में हकीर दुनियां,
मेरे बराबर से चल रही है,
हर इक क़दम पर उछल रही है,
उछल रही है,मचल रही है,
हवा से आगे निकल रही है,
लो मुझको देखो,अकेली होकर,
भी मेरी दुनियां संभल रही है,
जहां का नक्शा बदल रही है,
बदल रही है,बदल ही देगी...
उर्मिला माधव.
8.5.2017
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