Posts

Showing posts from December, 2021

आपकी कसम

दुनियाँ से कुछ मिला भी नहीं...आपकी क़सम, और हमको कुछ गिला भी नहीं,आपकी क़सम, हम उम्र भर निभाया किये...मुश्किलों के साथ,  और इसका कुछ सिला भी नहीं,आपकी क़सम, किस दरज़ा हम जगाते रहे.....कम नसीब को, ये टस से मस हिला भी नहीं....आपकी क़सम, हर तरहा अजनबी थे हर-इक शहर के लिए, जाना कोई जिला भी नहीं....आपकी क़सम,   रहती थी जुस्तजू सी....किसी ख़ास शख्स की,  बस फिर ये सिलसिला भी नहीं आपकी क़सम, --------------------------------------------- duniyan se kuchh mila bhi nahin aapki qasam, aur hamko kuchh gilaa bhi nahin aapki qasam, ham umr nibhaaya kiye mushkilon ke saath , aur iskaa kuchh silaa bhi nahin aapki qasam, kis darzaa ham jagaate rahe qamnaseeb ko, ye tas se mas hilaa bhi nahin aapki qasam, har tarhaa ajnabii the har-ik shahar ke liye, jaanaa koi jilaa bhi nahin.......aapki qasam, rahati thi justjoo sii kisi khaas shakhs kii, phir thaa ye silsilaa bhi nahin,aapki qasam... उर्मिला माधव... 26.12.2013...

ये मेरी हस्ती है

ये मेरी हस्ती है और मैं हूँ जनाब, आपके कहने से होगी क्यूँ ख़राब, देख कर ऐब-ओ-हुनर इनसान के, क्या बजाते फिरते हो ये मुंह जनाब, मैं भी ग़र कहने पे जो आ जाऊं तो, आप क्या दे पायेंगे पूछूं जवाब ? आप भी अपना गिरेबां झाँक लें, तब समझ में आएगा,क्या हूँ नवाब ? अपने हाथों से मसल कर आबरू, क्यूँ बढ़ाते हैं मुसलसल यूँ अज़ाब, क्यूँ किसीकी ठोकरों पर हो जहां, आप ही को समझे कोई,क्यूँ नवाब... ------------------------------------------------ Ye meri hasti hai or main hun janab, Aapke kahane se hogi kyun kharaab? Dekh kar aib-o-hunar bas gair ke Kya bajate phirte ho ye munh janab Main bhi gar kahne pe jo aa jaaun to, Aap kya de paayenge phir yun jawaab, Aap bhi apna girebaan jhaank len, Tab samajh main aayega lubbe luwaab, Apne hathon khud masal kar aabruu Kyun badhaate hain musalsal yun azaab, Kyun kisiki thokron par ho jahaan, Aap hii ko samjhe koii kyun navaab... #उर्मिलामाधव... 26.12.2015

मैंने सोचा ही नहीं

मैंने सोचा ही नहीं हिन्दू या मुसलमां होकर, दिल-ए-हस्सास मेरा निकला महज़ हां होकर, मेरे नज़दीक जो आया था गोल टोपी लिए, खाना लेना है मुझे जाऊं कहां यां होकर ? एक मज़लूम था बच्चा जो मेरी बाँहों में, और सब भूल गई सोचा फ़क़त मां होकर, उर्मिला माधव, 22.12.2017

ये क्या?

दिल मिरा मर गया मगर' ये क्या? सिर्फ़ शमशान तक सफ़र, ये क्या? ख़ुद को ख़ुद से ही रब्त रखना है फिर तुझे लग रहा है डर? ये क्या? इसमें कुछ भी नहीं है, जंगल है, और फिर  ढूंढता है घर, ये क्या? अब वो पाबन्दियां कहीं भी नहीं फिर तू सुनने लगा बजर, ये क्या?

तिरछी नज़र की धार पे

तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए, यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए, अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी, पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए, अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे हम ही जूनून-ए-इश्क़ का सामान हो गए, वो याद हमको आये तो मुश्किल गुज़र गई एक रोज़ उनके घर गए,मेहमान हो गए.. दुनियां को दरकिनार भी हमने किया बहुत ज़िंदान-ए-इश्क़ क्या हुए सुल्तान हो गए।। उर्मिला माधव

ज़रा सी बात थी

ज़रा सी बात थी वो झूठ पर उतर आया, बला का सच था बड़ी दूर तक नज़र आया, ज़ुबां को बंद रखा मैंने कुछ कहा ही नहीं, तो सारी उम्र मिरी ज़ीस्त पर असर आया... वो एक रंग महज़ जिसकी मुझको आदत थी, सो मेरे हिस्से वही ग़म का इक सफ़र आया, वो जिसके टूट के गिरने से डर रहे थे सभी, कमाल ये कि उसी शाख़ पर समर आया, Zara si baat thi wo jhuth par utar aaya, Balaa ka sach tha, badi door tak nazar aaya, ZubaaN ko band rakha maine kuchh kaha hi nahin, To saari umr meri zeest par asar aayaa, Wo ek rang mahaz jiski hmujhko aadat thi, So mere. Hisse wahi gham ka ik safar aayaa.. Wo jiske tuut ke girne se dar rahe the sabhi, Kamaal ye ke usi shaakh pe samar aayaa.... Urmila Madhav

हैरत नहीं हुई

वो बेवफ़ा है जानके हैरत नहीं हुई, हमको भी उसके साथ की आदत नहीं हुई, हम रो रहे थे ज़ोर से ये जानते हैं सब, गुज़रे हुए ये वाक़या मुद्दत नहीं हुई.. अच्छा हुआ कि उससे कभी कुछ नहीं कहा उसको भी आगे बढ़ने की जुरअत नहीं हुई... उर्मिला माधव

महरूम कर जो जाएगा

तू मुहब्बत से हमें महरूम कर जो जाएगा, खूब तनहा रोयेगा,और बे-वफ़ा कहलायेगा, इतने सारे बेबसी के दाग दिल पे होंगे तब, आंसुओं से धोते-धोते,आप ही थक जाएगा, गुफ्तगू के हर्फ जब-जब याद तुझको आयेंगे, लोग बोलेंगे मगर तू कुछ नहीं कह पायेगा, too muhabbat se hamen mahroom kar jo jaayega, khoob tabhaa royegaa,or be-wafaa kahlaayegaa, itne saare be-basii ke daag dil par honge tab, aansuon se dhote-dhote,aap hi thak jaayegaa, guftgu ke harf jab-jab.....yaad tujhko aayenge, log bolenge magar too kuchh nahin kah paayega.. उर्मिला माधव... 15.12.2013..

kya karun

दश्त जब हो ही गया मेरा कलेजा क्या करूँ, वहशतें या हसरतें जो भी हैं लेजा, क्या करूँ , दिल हथेली पै रखा और साथ में इक ख़त दिया, कुछ नहीं बाकी बचा है क्यों ये भेजा, क्या करूँ, हर घड़ी हलकान रहना और न सोना रात भर, और जो तनहाई दी थी,वो भी है जा, क्या करूँ, कब तलक चल पाएगी ये एक तरफ़ा ज़्यादती, मैं भी जानूँ हूँ तग़ाफ़ुल जा कहे जा, क्या करूँ, मुझको सुनना ही नहीं है,तल्ख़ियों का फ़लसफ़ा, उम्र भर तो मैंने तनहा ,ग़म सहेजा, क्या करूँ #उर्मिलामाधव... 15.12.2014..

दश्त जब हो ही गया

दश्त जब हो ही गया मेरा कलेजा क्या करूँ, उम्र भर तो मैंने तनहा ,ग़म सहेजा, क्या करूँ, Dasht jab ho hi gayaa mera kaleja,kya karun, Umr bhar to maine,tanha,gam saheja, kya karun, दिल हथेली पै रखा और साथ में इक ख़त दिया, कुछ नहीं बाकी बचा है क्यों ये भेजा, क्या करूँ, Dil hatheli pe rakha or sath me,n ek khat diya, Kuchh nahi,n baaqi bacha hai,kyun ye bheja,kya karun?, हर घड़ी हलकान रहना और न सोना रात भर, और जो तनहाई दी थी,वो भी है जा, क्या करूँ, Har ghadi halkan rahna or n sona raat bhar, Or jo tanha,ii dii thii wo bhi hai,jaa kya karun, कब तलक चल पाएगी ये एक तरफ़ा ज़्यादती, मैं भी जानूँ हूँ तग़ाफ़ुल जा कहे जा, क्या करूँ, Kab talak chal payegi ye,ek tarfaa,zyadatii, Main bhi jaanun hun tagaful,ja kahe jaa kya karun, मुझको सुनना ही नहीं है,तल्ख़ियों का फ़लसफ़ा, वहशतें या हसरतें जो भी हैं लेजा, क्या करूँ , Mujhko sun,na hii nahi,n hai talkhiyon ka falsafa,a, Vahshate,n ya dahshate,n jo bhi hain,leja,kya karun? #उर्मिलामाधव... 15.12.2014..

नज़्म, कड़े फ़िकरे

कड़े फिकरे कोई कह कर, चला जाता था जो अक्सर, तग़ाफ़ुल उसकी नज़रों में, कभी देखा था जो मैंने, वो मुझको याद आता है।। ज़मीं जब ज़ख़्म धोती थी, फ़लक़ रह-रह के रोता था , कहीं तन्हाई में जाकर, कोई दामन भिगोता था वो मुझको याद आता है।। कहीं पर माँ बिछुड़ जाना, न ये दुनियां समझ पाना, किसी बच्चे की आँखें थीं कहीं जब मुन्तज़िर माँ की, वो मुझको याद आता है।। कोई मय्यत के आगे बैठकर, रोया नहीं हरगिज़, मगर आरिज़ की सुर्खी, कह रही थी,हाल अश्कों का, वो मुझको याद आता है।। कोई मंज़िल न थी फिर भी, मुसलसल,चल रही थी मैं, निशां क़दमों के दुनियां को, नहीं दिखते थे,जाने क्यूँ, वो मुझको याद आता है।। उर्मिला माधव, 20.4.2016

जिसका मुझको ज्ञान नहीं है

जिसका मुझको ज्ञान नहीं है, वो मुझको ...आसान नहीं है.. ऐसा शब्द कभी ना बोलें, जिसका कोई भान नहीं है.. शब्दों में कुछ लिख कर पाना, किंचित भी सम्मान नहीं है.. सूर्य उगा और अस्त हो गया, मात्र वही दिनमान नहीं है.. उड़ता हो उपहास तुम्हारा, वो सुख में व्यवधान नहीं है.. चलते चलते थक जाना ही, जीवन का अवसान नहीं है.. उर्मिला माधव

चूँ चूँ का मुरब्बा

चूं-चूं का मुरब्बा...😊😊😊 अपने ही ढर्रे पे जीना सीखो यार, वरना जितना चाहो उतना झींको यार, आसमान पर उड़ते ही तो रहते हो, नीचे भी तो कभी-कभी तुम दीखो यार, के हो गयो, क्यूँ थारी जुल्फां बिखरीं, थारे मुंह को घणो रंग है फीको यार, कित्थे-कित्थे फिरदे रैन्दे हो पाजी, रोउन्न लागी त्वाड्डी प्यारी प्रीतो यार, सब के सब बुध्धू तो घर को लौट गए, हम क्यों भूलें अपने घर की गली को यार.. 😊 उर्मिला माधव 15.12.2017

चूँ चूँ का मुरब्बा

चूं-चूं का मुरब्बा...😊😊😊 अपने ही ढर्रे पे जीना सीखो यार, वरना जितना चाहो उतना झींको यार, आसमान पर उड़ते ही तो रहते हो, नीचे भी तो कभी-कभी तुम दीखो यार, के हो गयो, क्यूँ थारी जुल्फां बिखरीं, थारे मुंह को घणो रंग है फीको यार, कित्थे-कित्थे फिरदे रैन्दे हो पाजी, रोउन्न लागी त्वाड्डी प्यारी प्रीतो यार, सब के सब बुध्धू तो घर को लौट गए, हम क्यों भूलें अपने घर की गली को यार.. 😊 उर्मिला माधव 15.12.2017
तुम हमारे ज़ख़्म पे चर्चा किये ही जा रहे हो, क्यूं हमारे अश्क़ यूँ रुसवा किये ही जा रहे हो, हमको हैरत है कि हमसे क्यूं गुरेज़ां हो अबस? दूर हमसे हों सभी, फ़तवा किये ही जा रहे हो

नहीं चाहा कभी मैंने

नहीं चाहा कभी मैंने ......के मेरी बादशाहत हो, तमन्ना सिर्फ इतनी थी के मेरे दिल को राहत हो, :: Nahi chaha kabhi maine ke meri baadshahat ho, Tamanna sirf itni thi ke mere dil ko raahat ho #उर्मिलामाधव.... 7.12.2015.

क्या ख़बर तुझको क्या हक़ीक़त है

क्या ख़बर तुझको,क्या हकीक़त है, ज़िन्दगी ......मौत की ही आहट है, यूँ मयस्सर हज़ार खुशियाँ हैं , पर कहीं इसमें कुछ मिलावट है, मिलने वाले हज़ार मिलते हैं, वो नहीं,जिसकी हमको चाहत है, राम कहले रहीम कह ले पर,  रोज़-ए-महशर असल इबादत है, एक तमाशा है जिंदगानी भी  जिसकी खातिर अज़ीम शिद्दत है, जो न पैदा अगर हुआ होता, कौन कहता के चल बुलाहट है? #उर्मिलामाधव.. 7.12.2015

तीन शेर

तीन शेर  अजीब हाल में रहने लगे थके से क़दम, मलाल दिल को रहा आबले छुपाते हुए.. कभी हुआ ही नहीं हमसे जिन ग़मों का हिसाब, ज़माना रोने लगा वो सफ़हे गिनाते हुए, जो चाहता था मिरी रूह से बातें करना, वो रो पड़ा था मुझे मर्सिया सुनाते हुए, उर्मिला माधव, 7.12 2017

पैदा किया है आलमे

पैदा किया है आलमे तनहाई ख़ुद बख़ुद, देखी है हमने वहशते रुसवाई ख़ुद बख़ुद जो-जो हुआ है वो ही तो होना था दोस्तो, जब ज़िन्दगी के हो गए शैदाई ख़ुद बख़ुद, इक फ़ासले के साथ ही चलने की ज़िद हुई, मशहूर ख़ुद को कर दिया, हरजाई ख़ुद बख़ुद, बेलौस चलते-चलते भी डरने लगे थे हम, धड़कन हज़ार हादिसे ले आई ख़ुद बख़ुद, दानिशवरों की भीड़ का हुज्जूम इक तरफ़, हद-हद से बढ़ के आ गई दानाई ख़ुद बख़ुद, इस उम्र भर की दौड़ का हासिल था एक दिन, महशर के रोज़ बढ़ गई रानाई ख़ुद बख़ुद, उर्मिला माधव 7.12.3018

साज़िश घुली आ रही है

हवाओं में साज़िश घुली आ रही है, सखावत की रंगत धुली जा रही है, मुहब्बत को मीज़ान पर क्या रखोगे, ज़का से लक़ा तक तुली आ रही है, अमानत में तुमने जो की है ख़यानत वो पोशीदगी भी खुली जा रही है उर्मिला माधव 5.12.2016

ख़्वाब सजाना आता है

मुझको ग़म में ख़्वाब सजाना आता है, उल्फ़त का दस्तूर निभाना आता है, कोई साज़िश रचके रुसवा ख़ूब करे, आगे बढ़कर प्यार दिखाना आता है, फ़र्क़ समझना आजाता है पल भर में, हंस हंस के हर बात भुलाना आता है, चश्म-ए-गिरियाँ पलकों में ही रहते हैं, ग़म का हर सैलाब छुपाना आता है, तहज़ीबें महदूद मुझे कर देती हैं, मुझको भी सुर्ख़ाब उड़ाना आता है... उर्मिला माधव... 2.12.2016..

charagh bujhne lage

 चराग़ बुझने लगे,नींद अब कहाँ है बता, न जाने कब से मेरी आँख दे रही है सदा, कहाँ सुकून,कहाँ ज़ब्त औऱ ये ख़ामोशी, हयात कब से मुझे यूँ ही दे रही है सज़ा, क़यास-ए-कल्ब मेरा और अदा ज़माने की, ये तीरगी भी फ़क़त ग़म को दे रही है हवा, उर्मिला माधव

का होगौ

औरन कूं कै रये औ काफिर का होगौ? मैल तुम्हारे जी कौ जाहिर का होगौ? बखत परौ तौ हाथ जोरि कें झुक लीने, हमनें प्रश्न उठायौ तौ फिर का होगौ?