तिरछी नज़र की धार पे

तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए,
यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए,

अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी,
पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए,

अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे
हम ही जूनून-ए-इश्क़ का सामान हो गए,

वो याद हमको आये तो मुश्किल गुज़र गई
एक रोज़ उनके घर गए,मेहमान हो गए..

दुनियां को दरकिनार भी हमने किया बहुत
ज़िंदान-ए-इश्क़ क्या हुए सुल्तान हो गए।।
उर्मिला माधव

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