मैंने सोचा ही नहीं
मैंने सोचा ही नहीं हिन्दू या मुसलमां होकर,
दिल-ए-हस्सास मेरा निकला महज़ हां होकर,
मेरे नज़दीक जो आया था गोल टोपी लिए,
खाना लेना है मुझे जाऊं कहां यां होकर ?
एक मज़लूम था बच्चा जो मेरी बाँहों में,
और सब भूल गई सोचा फ़क़त मां होकर,
उर्मिला माधव,
22.12.2017
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