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Showing posts from May, 2025

छंद

अपनी-अपनी बेर को चाहें शिष्टाचार, वे जो सच्ची बात का,करते हैं प्रतिकार.. करते हैं प्रतिकार समय पर सच ना बोलें, भारी पलड़ा देख उसी के संग-संग होलें, आवश्यक है उनको माला उल्टी जपनी, सुनो-सुनो,मत सुनो कहेंगे,अपनी-अपनी. उर्मिला माधव, 29th मई 2017..

ताबूत में

इस क़दर ठोकी गईं कीलें, मिरे ताबूत में, बाद मरने के ये जाना, दुख्तर-ए-ईसा थी मैं, उर्मिला माधव

हकीकत बबा जू समझनी परेगी

ब्रज की दुनियां बाबा राम रहीम की गिरफ़्तारी हकीकत बबा जू,समझनी परैगी, मजा की सजा तौ,भुगतनी परैगी, न बैय्यर की इज्जत है मिसरी कौ ढेला, जि गोली कुनैनी,गटकनी परैगी, घड़ी तुमनें बांधी है,सोने की मन भर, तौ लोहेउ की तुमकूँ पहरनी परैगी, बो सोने के बिस्तर,ऑ चांदी के तकिया, न मिलने ऐं, आदत बदलनी परैगी, जुआँ तेरी डाढ़ी में डोलिंगे बाबा, जे दाढ़िउ तौ दारी, कतरनी परैगी, न पहलें उतारौ जे कारौ सौ चश्मा, तौ चश्मा बिगर, गैल चलनी परैगी, जे फंदा लहैं कौ, दहैं ते कटैगौ, जो करनी करी ऐ तौ,भरनी परैगी.. उर्मिला माधव,

परिकल्पना है

ये तुम्हारे मन की ही परिकल्पना है मैं जहाँ हूँ बस वहीँ हूँ, दिन प्रतीक्षित हो गया, अनमने हो जानती हूँ, पर ये देखो वेदना का एक सागर, कर नही सकती हूँ मैं इसको उजागर, ये प्रतीक्षित मन बिलखने पर अड़ा है, ज़िद्दी है न देखलो ये बिन तुम्हारे आये, कब कब मानता है? मैं चली जाऊँ तब इसके पास आना, जो तुम्हें चुभता है वो इसको बताना, मुझसे मत बोलो मेरे मन से तो बोलो, इस तरह से रूठना अच्छा नहीं है, राह सूनी लग रही है देख भी लो, फूल चुप हैं,शूल चुप हैं, और समय प्रतिकूल चुप है, बोलना मुझसे नहीं कोई चाहता है, रास्ता ये सब तुम्हारा देखते हैं, छोड़ दो मुझको मगर इनसे न रूठो, ये जो बस खुशबू तुम्हारी चाहते हैं, मैं कसम देती हूँ इनके पास आओ, फिर चले जाना.... #उर्मिलामाधव... 27.5,2015

तुम बड़े हो

तुम बड़े से हो या हो छोटे से, चुप कराना किसीको रोते से, शोर करना तो बस हिमाक़त है, क्यूँ जगाना किसीको सोते से ? उर्मिला माधव 

अजनबी सी नज़्म

ये दिल ढूँढता है जगहा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी, कभी ज़िंदगी में ये दिन भी दिखाना, के हर सम्त इक अजनबी रंग लाना, ज़मीं अजनबी,आसमां अजनबी हो, कोई शख्स हो रु-ब-रु,अजनबी हो, लगे जिसकी हर इक अदा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी..... हथेली पे हों नाम कुछ अजनबी से, पढ़े ही न जाएँ,पढ़ें हम कहीं से, हो रूह-ओ-ज़ेहन से तलब अजनबी सी  सुनो मुख़्तसर,कुल जहां अजनबी हो, मिले दर्द-ए-दिल को दवा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी... उर्मिला माधव 
तमन्ना दीद की है ना किसी दिलदार की ख़ाहिश

लूट ले गए

चुपके से आए,जान-ओ-जिगर लूट ले गए,  हमको बताया तक नहीं घर लूट ले गए , किसको बताएं हाल ऐसी बेबसी का उफ़,  जीना मुहाल,शाम-ओ-सहर लूट ले गए, जो मुन्तजिर रहें तो भला क्या रहें कहो,  हम उम्र भर चले वो सफ़र लूट ले गए,  ख़ामा खयालियों में रहे दोस्त सब के सब,  चर्चा हमारा था वो असर लूट ले गए, जो तर्ज़ कोई बन सकी तो काफ़िया गलत,  वो ज़िन्दगी बे-खौफ़-ओ-ख़तर लूट ले गए... उर्मिला माधव... 

मैं तुमको ढूंढती थी

मैं तुमको ढूंढती थी,कल रात तुम कहाँ थे? आँखों में दम नही था,जज़्बात बस रवां थे, कुछ हौसला बढाकर देखा जो आसमां को, महताब कह रहा था तुम उसके रहनुमां थे, रह-रह के बिजलियाँ सी,कौंधा करीं सहन में, बेताब जुगनुओं के अरमान सब जवां थे, एक अक्स चांदनी का पानी पै पड़ रहा था, ख़ामोश आँधियों के आसार सब निहाँ थे, क़ुदरत की दुश्मनी है,कितनी उधार रातें, सागर बता रहा था तुम उससे आशनां थे, काग़ज़ की नाव लेकर इस पार मैं खड़ी थी. आँखों की कोर नम थी,उस पार तुम वहां थे..... #उर्मिलामाधव.. 25.5.2015..

जय शिव शंकर

जय शिवशंकर, जय गंगाधर, करूणाकर करतार हरे। जय कैलाशी, जय अविनाशी, सुखराशी सुखसार हरे। जय शशिशेखर, जय डमरूधर, जय जय प्रेमागार हरे। जय त्रिपुरारी, जय मदहारी, नित्य अनन्त अपार हरे। निर्गुण जय जय सगुण अनामय निराकार साकार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।1।। जय रामेश्वर, जय नागेश्वर, वैद्यनाथ, केदार हरे। मल्लिकार्जुन, सोमनाथ, जय महाकार, ओंकार हरे। जय त्रयम्बकेश्वर, जय भुवनेश्वर, भीमेश्वर, जगतार हरे। काशीपति श्री विश्वनाथ जय मंगलमय अधहार हरे। नीलकंठ, जय भूतनाथ, जय मृतुंजय अविकार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।2।। भोलानाथ कृपालु दयामय अवढर दानी शिवयोगी। निमिष मात्र में देते है नवनिधि मनमानी शिवयोगी। सरल हृदय अति करूणासागर अकथ कहानी शिवयोगी। भक्तों पर सर्वस्व लुटाकर बने मसानी शिवयोगी। स्वयं अकिंचन जन मन रंजन पर शिव परम उदार हरे। पारवती पति हर-हर शम्भो पाहि-पाहि दातार हरे।।3।। आशुतोष इस मोहमयी निद्रा मुझे जगा देना। विषय वेदना से विषयों की मायाधीश छुड़ा देना। रूप सुधा की एक बूद से जीवन मुक्त बना देना। दिव्य ज्ञान भण्डार युगल चरणों की लगन लगा देना। एक बार इस मन मन...

दुहाई दस्तार की

वो के जिनको थी ज़रूरत प्यार की, क्यों दुहाई दे गए दस्तार की... तितलियों के रंग दिखला कर हमें, बस .मिटाते हैं खिजालत हार की, हम से बढ़कर कौन जाना है उन्हें, दास्तां क्या है दिले बीमार की. बस अना के नाम पर ही मिट गए, दिल में लेकर हसरतें दीदार की. उर्मिला माधव

ये उदासी बड़ी पुरानी है

ये उदासी बड़ी पुरानी है, इसके पीछे भी इक कहानी है, ख़ैर सबको सुनाके क्या होगा, उम्र भर की ये नातवानी है, उर्मिला माधव

झूठ के आगे सच्चा

झूट के आगे सच्चा रोने लगता है, दिल ही दिल में ग़म भी ढोने लगता है, ख़ामोशी से बढ़ के जब ख़ामोशी हो, रफ़्ता-रफ़्ता सब्र भी खोने लगता है, जब्र कहीं पर हो तो फिर वो सब्र कहाँ, आंखों में बस अश्क़ पिरोने लगता है.. उर्मिला माधव

आदमी कुछ अजीब लगता था

एक नज़्म... (पुराने पन्नों से) आदमी कुछ अजीब लगता था, ज़िंदगी सा करीब लगता था, उन दिनों दिल का एक आलम था, मुश्किलों का असर ज़रा कम था , उसको देखे से चैन मिलता था, बस खुदा से वो ऐन मिलता था, अपनी दुनियाँ,बहार होती थी, आँख जब उससे चार होती थी उसने अपना चलन बदल डाला, मेरे दिल का चमन कुचल डाला, बाद उसके तो फिर ये होना था, अपने दामन को ही भिगोना था, यूँ सहर अब भी रोज़ होती है, उसकी आमद से खूब रोती है, दिल की कूव्वत जवाब देती है, उम्र भर का हिसाब लेती है... उर्मिला माधव... 7.11.2014...

सज़ा दे रही हूं मैं

कब से बुलंदियों को सज़ा दे रही हूं मैं, दिल को ग़लत जगह का पता दे रही हूँ मैं, सेहरा से रेत लेके,बनाया है पैराहन, तूफां को बिजलियों को सदा दे रही हूं मैं, दरकार ही नहीं है मुझे कोई ग़म गुसार, अब ख़ुद ही रहगुज़र को दगा दे रही हूँ मैं, चलती रही हूं कब से अबस रंज ओ गम के साथ, अफ़सुर्दगी में ग़म को हवा दे रही हूं मैं, ऐ ज़िन्दगी मैं तेरे तईं, सोचती हूँ अब, किस बदगुमां को अपनी वफ़ा दे रही हूं मैं, उर्मिला माधव.. 20.5.2017

दुश्मनी देखी

पहले तो ख़ूब सनसनी देखी, उम्र भर सिर्फ़ दुश्मनी देखी, फिर तो बस सिर्फ़ दुश्मनी देखी mm

मसकन बनाना है

रेत पर मसकन बनाना है मुझे बस, अपने ख़्वाबों को सजाना है मुझे बस, तुम न बसने पाओगे इनमें कभी अब, क्यूँकि तुमसे दूर जाना है मुझे बस, मुझको न दरक़ार है कोई तवक्को, ख़ुद ब ख़ुद ही मुस्कुराना है मुझे बस, हाँ मैं तनहा हूँ मगर ग़ाफ़िल नहीं हूँ, हौसले से चलते जाना है मुझे बस, ना मलक अब खाए हरग़िज़,देखना है, इस तरह खिरमन बचाना है मुझे बस, हो रहे तूफ़ान दिल में चाहे जितना, दिल को ही मदफ़न बनाना है मुझे बस, दिल को ही मदफ़न बनाना है मुझे बस।..Urmila Madhav. 13.5.2013.

वो इक नज़र

वो इक नज़र कि जिसके हमेशा ग़ुलाम थे, वो छिन गई तो हमने ग़ुलामी ही छोड़ दी, उतने सह्ल कहाँ है भला इस जहां के लोग, हमने कोई भी दुनिया, बनानी ही छोड़ दी, वो आंख मुद गई तो वहीं वक़्त रुक गया, हमने वफ़ा की शमअ जलानी ही छोड़ दी, उर्मिला माधव

ज़िंदगी का आलम है

बस यही ज़िन्दगी का आलम है, जब भी देखो तो आँख पुरनम है, यूँ तो वो दिल में अब भी रहते हैं, फ़र्क़ इतना है,जुस्तजू कम है, या हैं अनजान रस्म-ए-उल्फत से, या नहीं दिल में कोई दम ख़म है, हाँ मुहब्बत है हमने कह तो।दिया, दिल में काबा है,आब-ए-जमजम है, उनके हिम्मत जिगर में है ही नहीं, फिर तो वो कुछ नही,यही गम है... #उर्मिलामाधव... 8.5.2015

ख़ून के रिश्ते

खून के रिश्ते जो मेरे नाम थे, ज़िन्दगी के वास्ते इल्ज़ाम थे, हक़ अदा करते रहे रुसवाई का, अश्क़ मेरे जा-ब-जा बदनाम थे, फासलों की बढ़ गयी रस्सा-कशी, जो तग़ाफ़ुल का लिए पैग़ाम थे, था मुहब्बत का जिन्हें दावा बहुत, मुश्किलों के वक़्त वो नाकाम थे, एक तिनका जो मिला सौग़ात में, कीमती था और उसी के दाम थे, आज उसके नाम से जिंदा हूँ मैं, जिसके छोटे हाथ छोटे ग़ाम थे... उर्मिला माधव... 1.4.2014...

कभी जो मुझसे कहे किसीने

एक नज़्म... कभी जो मुझसे कहे किसी ने, वो लफ़्ज़ अब तक चुभे हुए हैं, कई तो ऐसे भी दर्द हैं जो, अना के लब पर रुके हुए हैं, कभी-कभी ये जी चाहता है, इसे बता दूं,उसे बता दूं, मगर ये अश्क़ों के बोझ मेरी, बरौनियों में छुपे हुए हैं, ये अश्क़ लेकर सरे ज़माना, में फिर रही हूं,मैं हंस रही हूं, वहीं कहीं पर, ग़मों की ज़द में, पड़ोसियों सी मैं बस रही हूं, अगर यही बस शिकस्ता दुनियां, जो दुश्मनों सी खड़ी हुई है, नसीब में है,क़रीब में है, के पीटती है लकीर दुनियां, मेरी नज़र में हकीर दुनियां, मेरे बराबर से चल रही है, हर इक क़दम पर उछल रही है, उछल रही है,मचल रही है, हवा से आगे निकल रही है, लो मुझको देखो,अकेली होकर, भी मेरी दुनियां संभल रही है, जहां का नक्शा बदल रही है, बदल रही है,बदल ही देगी... उर्मिला माधव. 8.5.2017

वहशत सी हो रही है

नज़्म अजीब वहशत सी हो रही है, के घर के कोने झिझक रहे हैं, मुसीबतों के अलम खड़े हैं, सो अब ये कोने भी बच रहे हैं हमारी सूरत से ऊबते हैं, ये सोचते हैं हमारी बाबत, के घर के लोगों को क्या हुआ है, ये सब कभी भी कहीं न जाते, अजब है घर में पड़े हए हैं, खुली हवाएं कहाँ गई हैं, न कोई मेहमान आए घर में, ये सब जो आपस में हंस रहे हैं, मगर ये झूठी हंसी है सब की, हवाई चेहरों पे उड़ रही है, अजीब उलझन से लड़ रही है, दुआएं करता हर एक कोना, के ख़त्म हो जाए ये कॅरोना, उर्मिला माधव

आपके वस्त्र

आपके वस्त्र बहुत सुंदर हैं, किन्तु कुछ छोटे हैं, संभवतः कपड़े की तंगी रही होगी, या अधिक मंहगा होगा अन्यथा आप अत्यंत सुंदर हैं कपड़े की तंगी आपके मुखारविन्द तक  पहुंचने नहीं देती, संभवतः दर्पण कुछ नहीं कह पाया होगा आपसे आप को कपड़े की खींचतान ने व्यस्त रखा होगा समय मिले तो दर्पण ज़रूर देखना आप अत्यंत सुंदर हैं उर्मिला माधव

ये समझने में मुझे सदियां लगी हैं

रेत के रास्ते हैं रह-रह के बिखर जाते हैं, फिर भी चलना तो पड़ेगा, कोई उद्देश्य लेकर क्या चलूँ मैं, ये बताओ क्या करूँ चलना छोड़ दूँ? अनवरत है यत्न मेरा दूर जाने के लिए मेरी रातें थक गईं है,याद करके चैन अब मिलता नहीं कुछ बात करके आत्म केंद्रित होकर जीना ठीक होगा मैं किसी पीड़ा को सहलूं मुझमें वो ताक़त नहीं जो समय ने पीर दी है बाँध के छज्जे पै रख दी, तुम ज़रूरत थे मेरी,पर मुझे चलना पड़ा है साथ ख़ुद के क्या तुम्हें लगता है ये परस्पर दूरियां मिट पाएंगी अब? शायद मेरी तरफ से तो नही अब ज़रूरत थी निरंतर साथ की कौन समझाता तुम्हें  जो तुम्हें करना नहीं था कर रहे हो जाओ तुम आज़ाद हो  बस यहीं तक रास्ते मिलते थे अपने, मुझको लौटाना तुम्हारा काम था, क्या कहूँ पर  ये समझने में मुझे सदियाँ लगी हैं तुम ज़माने के लिए हो,लौट जाओ.. सबके पाने के लिए हो लौट जाओ दिल दुखाने के लिए हो लौट जाओ हाँ मैं कहती हूँ तुम्हें तुम लौट जाओ यूँ भी तो अब मैं नहीं आउंगी तुम तक लौट जाओ लौट जाओ लौट जाओ... #उर्मिलामाधव 10.9.2015

बांटा जाएगा

चश्मे गिरया कैसे बांटा जाएगा, वक़्त ही है मिल के काटा जाएगा, बंद मिज़गाँ हम रखेंगे हां मगर, आंख से हरगिज़ न कांटा जाएगा... उर्मिला माधव

सबके बस में है

इशारों में ज़माने को चलाना सबके बस में है, ज़रा मालूम हो ताक़त कहाँ कमज़ोर नस में है,  जला कर एक बीड़ी,रात भर बैठा रहा छत पै, उसे गफलत रही शायद कि वो दो चार दस में है, बनाने के लिए एक आशियाना चाहिए,सब कुछ, मगर पंछी के घर की खुशबुएँ जंगल के ख़स में है, उर्मिला माधव... 6.5.2014...

हो न सका

यही तो काम है जो मुझसे ठीक हो न सका, कोई भी मेरे जिगर के क़रीब हो न सका, ये दूरियां ही मुझे दूर तक चलाती रहीं, अजब मक़ाम था हरगिज़ नसीब हो न सका, मगर मैं फिर भी वहीं, बार-बार चलती रही, ये हौसला भी गजब था,ग़रीब हो न सका, हज़ार रंज थे,पुरख़ार मेरी दुनियां थी, मगर चे दर्द का क़तरा अतीक़ हो न सका, हज़ार शेर कहे और ग़ज़ल,रुबाई भी, ज़माना कहता रहा,दिल अदीब हो न सका... उर्मिला माधव अतीक़-आज़ाद

डराने लग गईं

दह्र की वीरानियाँ इतना डराने लग गईं, ख़ाब के परदे निगाहों से हटाने लग गईं ज़िन्दगी कुछ भी नहीं, ये साफ़ ज़ाहिर हो गया  जब बड़ी तादाद में जानें ठिकाने लग गईं.. उर्मिला माधव

गुज़र गई है जी

चूँकि हद से गुज़र गई है जी, आज सबको खबर गई है जी, मैंने दिल से उतार फेंका था, आज उसपै नज़र गई है जी, तेरी यादों में थी खुमारी जो, उम्र भर को उतर गई है जी, जो अना अब भी दिल पै तारी है, वो कभी तेरे घर गई है जी, मैंने यूँ ही ज़रा सा छेड़ा था, बात खुल के बिखर गई है जी.... उर्मिला माधव...

सिहर गए होते

इतना ज़्यादा घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक नज़र से कबके उतर गए होते  इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते, इतनी लम्बी उम्र गुज़ारी,तलवारों की धारों पर, लफ़्फ़ाज़ों से डर जाते तो,जाने किधर गए होते   एक तरफ बंदूकें दन-दन,एक तरफ ज़हरीला,गम  डरने की आदत गर होती, कितने सिहर गए होते, हम साहिल पर खड़े रहे और सैलाबों ने खेल किये, हम गर अपना रंग दिखाते,कितने जिगर गए होते, उर्मिला माधव... 3.5.2014...