मैं तुमको ढूंढती थी
मैं तुमको ढूंढती थी,कल रात तुम कहाँ थे?
आँखों में दम नही था,जज़्बात बस रवां थे,
कुछ हौसला बढाकर देखा जो आसमां को,
महताब कह रहा था तुम उसके रहनुमां थे,
रह-रह के बिजलियाँ सी,कौंधा करीं सहन में,
बेताब जुगनुओं के अरमान सब जवां थे,
एक अक्स चांदनी का पानी पै पड़ रहा था,
ख़ामोश आँधियों के आसार सब निहाँ थे,
क़ुदरत की दुश्मनी है,कितनी उधार रातें,
सागर बता रहा था तुम उससे आशनां थे,
काग़ज़ की नाव लेकर इस पार मैं खड़ी थी.
आँखों की कोर नम थी,उस पार तुम वहां थे.....
#उर्मिलामाधव..
25.5.2015..
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