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Showing posts from July, 2021

भित्ति चित्रों से उकेरे शब्द कुछ

भित्ति चित्रों से उकेरे शब्दअब कुछ, जिजिविषा भी छल रही है जब स्वयं को, जो सवेरे श्वांस में अब तक निहित थे, आ खड़े हैं बेधने अंतर अहम् को, दूर की अब दृष्टि धुंधलाने लगी है, और कब तक ढोयेंगे झूठे भरम को, उर्मिला माधव...

दुल्हन भेज दी

एक नज़्म सुर्ख़ जोड़े में सजा कर एक दुलहन भेज दी ज़िंदगी से खेलने को फूलों वाली सेज दी उसकी सारी गुड्डियाँ,सारे पटोले छीन कर उसकी दुनिया से ख़ुशी की सारी कलियाँ बीन कर सिर्फ़ तोहफ़े में दिए हैं,चन्द आँसू ,ज़ब्त,आहें, कै़दख़ाने की तरह दीं जिस्म से लिपटी निगाहें कितने किरदारों में जाने,उम्र भर अब नाचना है, अपने हिस्से के सभी क़िस्सों को ख़ुद ही जाँचना है.... एक लम्बी उम्र का अब दायरा करना है तय, अपना सब कुछ भूल कर,दूजों के गम को बांटना है, उर्मिला माधव  पटोले---- गुड्डे...

सुनसान है

कोई भी ग़ुज़रा नहीं है रहगुज़र सुनसान है, वास्ते मेरे मगर........हर ज़र्रे में तूफ़ान है, क्या कहूँ अब जा ब जा घुटने लगा है दम बहुत, मेरे ग़म को देख कर वाद-ए-सवा हलकान है, चीखती रहती है...मेरी आह मेरी रूह में, और बाक़ी है कहानी ये महज़ उन्वान है, एक पत्थर तोड़कर दिल,होगया है अब ख़ुदा, मेरा दिल ग़ाफ़िल रहा के वो बहुत इंसान है, उसने तोहफ़े में दिए जो आहो नाले रंजो,ग़म, मेरे घर में आजतक अब तक वही सामान है.... -------------------------------------------- koii bhi guzra nahin hai rahguzar sunsaan hai, wwaste meremagar,har zarre main toofaan hai, kya kahun ab ja-b-ja ghutne lagaa hai dum bahut, mere gum ko dekh ka....waad-e-saba halkaan hai, cheekhtii rahti hain.....meri aahen,meri rooh main, or baaqi hai kahaani...........ye mahaz unvaan hai, ek paththar,tod kar dil.......hogaya hai ab khudaa, mera dil ghafil rahaa.........ke wo bahut insaan hai, usne tohfe main diye jo aah-o-naale ranj-o-gum, mere ghar main aaj tak ab tak wahi saamaan hai Urmila Madhav.. ----------उर्मिला माधव------------ 25....

लड़ते चले गए

सब हिम्मतों को जोड़के लड़ते चले गए, हालात थे कि दिल के बिगड़ते चले गए, दिल अपने रंग में था हम अपने रंग में, दोनों ही अपनी बात पै अड़ते चले गए, रोने से हमको उज्र था सो रोये भी नहीं, सबको भरम रहा के अकड़ते चले गए, चाहत थी इब्तिदा की मगर वो नहीं हुई, बस आख़री सिरे को, पकड़ते चले गए, डैने कतर के हम पै ज़माना बहुत हंसा, दुनियां के रंज हमको जकड़ते चले गए...   -------------------------------------------------- sab himmaton ko jod ke ladte chale gaye, haalaat the ki dil ke bigadte chale gaye, dil apne rang main tha o ham apne rang main, donon hii apnii baat pe adte chale gaye, rone se hamko ujr thaa so roye bhii nahin, sabko bharam rahaa ke akadte chale gaye, chahat thi ibtidaa ki,magar wo nahin huii, bas aakhrii sire ko pakadte chale gaye, daine katar ke ham pe zamaana bahut hansaa, duniyan ke ranj hamko jakadte chale gaye... #उर्मिलामाधव.. 25.7.2015...

दस्तार क्या?

ग़ज़ल---- बख्श देगा हमको ये बाज़ार क्या?? हम बचा पायेंगे अब दस्तार क्या ?? बोलियाँ इज्ज़त की यूँ लगने लगीं, साफ़ ज़ाहिर था के हैं आसार क्या ?? सोच कर हालात हम घबरा गए , हार जाएगा अबस किरदार क्या ?? लोग सब आ-आके ये पूछा किये, ज़िंदगी से डर गए हो यार क्या ?? मौत की तारीकियां कहने लगीं, वाक़ई तुम होगये बेज़ार क्या ?? #उर्मिलामाधव... 24.7.2014...

घबराने लगे

क्या जगह कहलाएगी मेरी ज़मीं पर ? जिनके घर पैदा हुई वो लोग घबराने लगे, ताल्लुक़ वाले मुझे सब देखने आने लगे, मेरी पैदाइश पै घर के लोग शर्माने लगे, अपनी जानिब से मुहब्बत ख़ूब दिखलाने लगे  माँ के चेहरे पर हज़ारों दर्द जब आने लगे, जाने कैसे लफ्ज़ थे जो माँ को बस ताने लगे, #उर्मिलामाधव  25.7.2015

डर रही हूँ

खुली बग़ावत है ज़िन्दगी से, मैं धड़कनों से मुकर रही हूं, के अब न भाती हैं सर्द आहें, मैं सब दहानों से डर रही हूं, यूँ रूह कहती है अब तड़प के, हज़ारों सदियों से मर रही हूं, ये जिस्म जैसे लहद हो मेरी, इसी के अंदर बिखर रही हूं, उर्मिला माधव 25.7.2018

ग़ुरूर से

ग़ज़ल  न तू देख इतने ग़ुरूर से, कि मैं लौट जाऊंगी दूर से, ये पयाम तेरी नज़र को है, इसे जोड़ दिल के सुरूर से, मेरे ग़म से तू भी है, पुरअसर, मेरा दावा है मैं ग़लत नही, न तू ऐतक़ाफ़ से काम ले, आ बचा ले ख़ुद को क़ुसूर से, तू ही मेरे दिल का क़रार है, तुझे सोचती हूँ मैं रात दिन, मेरी शाम है तेरी जुस्तजू, है सहर भी तेरे ही नूर से, मेरे दिल का कौन हफ़ीज़ है, तेरी दूरियां ही ज़वाल हैं, ये बता कि किससे गिला करूं जो मिले हैं दर्द ग़ुरूर से, ये बयान देना पड़ा मुझे, तेरी जुस्तजू के सवाल पर, कभी ज़िन्दगी में विसाल हो, तो कहूंगी पूरे शऊर से.. उर्मिला माधव

बदलना होगा

अब तो हर ख़ाब का नक्शा ही बदलना होगा, हर तख़य्युल को सर-ए-शाम ही ढलना होगा, ज़ेर-ए-जज़्बात है हर बात चुभी नश्तर सी, यूँ के ज़ख़्मों पे नमक, आप ही मलना होगा, उर्मिला माधव 24.7.2018

इक ज़ख़ीरा

इक ज़ख़ीरा मुश्किलों का दिल पे है रख्खा हुआ, और हर इक बज़्म में इस बात का चर्चा हुआ, हम भी ये दिन मुश्किलों से देख पाये हैं हुज़ूर, तीरगी काफ़ूर थी और चांद भी हंसता हुआ, हम अंधेरी रात के किस्से सुना सकते थे बस, आज देखा रात का कुछ रंग सा बदला हुआ, हमको सावन से मुहब्बत सी हुई है दफ़अतन, गोकि अपना बिजलियों से दर्द का सौदा हुआ, उर्मिला माधव

घबरा गए

एक ज़रा सी ....चोट से घबरा गए? हमको देखो हम कहाँ तक आगए , चांदनी हर बाम पै छिटकी रही, हम ही कसदन तीरगी में आगये, जुम्मा-जुम्मा आठ दिन के हो मियाँ, पथ्थरों से किसलिए टकरा गए !!!! देख लो मुड़ने से पहले चार सू, फिर नहीं कहना के तुम चकरा गए, दौड़ते रहते हो बस दीवाना वार  वो झटक के ज़ुल्फ़ क्या बिखरा गए  ------------------------------------------ ek zaraa sii chot se ghabraa gaye, hamko dekho ham kahan tak aa gaye, chaandnii har baam pe chhitkii rahi, ham hii kasdan tiirgii main aa gaye  jumma-jumma aath din ke ho miyaan, paththaron se kisliye takraa gaye, dekh lo mudne se pahle chaar suu, phir nahin kahna ke ham chakraa gaye, daudte rahte ho bas deewaanaa waar wo jhatak ke zulf kya bikhraa gaye.... #उर्मिलामाधव... 22.7.2015...

आसमां बन कर चले

इस ज़मी पर आसमां बन कर चले, हम अकेले "कारवां"बन कर चले... जो भी जी में आगया सच कह दिया, अपने हर्फ़ों की जुबां बन कर चले, यूँ समझ लो मील का पत्थर भी ख़ुद, और ख़ुद ही पासबां बन कर चले, मर्सिया भी ख़ुद-ब-ख़ुद ही पढ़ लिया, ख़ुद-ब-ख़ुद ही नौहा ख्वां बन कर चले, अपने क़दमों को कहीं रोका नहीं, बा अदब वक़्ते रवां बन कर चले... उर्मिला माधव... 21.7.2016

इज़ाफ़ा हो रहा है

क्यूं तमाशों में इज़ाफ़ा हो रहा है, आदमी अपना अदब क्यूं खो रहा है। इन नई नस्लों को क्या मिल पाएगा, जिसको देखो वो तड़प कर रो रहा है। क्या वो सोचे जिसकी दुनियां जल गई ख़ून के छींटे,मुसलसल धो रहा है। एक मुश्किल से जो छूटे गर कोई, बीज दूजा ज़ह्र के फिर बो रहा है। किस तरह पहुंचेंगी ये चीखें कहीं, कान मूंदे हर पड़ोसी सो रहा है। क्या नज़ारा और मुस्तक़बिल में हो, जो बुरा है वो बुरा ही तो रहा है। उर्मिला माधव, 13.7.2017

ताज़ा तरीन देखा

पहले से ख़्वाब हमने ज़्यादा हसीन देखा, जब धड़कनों को अपनी ताज़ा तरीन देखा, मुश्किल हुआ समझना,क्या ज़ेहन में लिखा है, जब शख्सियत को इतना ज़्यादः ज़हीन देखा, बारीकियां समझना,आसान तो नहीं था, जिस्म-ओ- जिगर पे होता चर्चा महीन देखा, कुछ अहमियत न देखी जज़्बात की जहां में, हर लम्हा ज़िन्दगी को ,ऐसी मशीन देखा, हैरत में हर कोई था ये देख कर यक़ायक, मेहताब को ज़मी पर, परदा नशीन देखा, उर्मिला माधव,

निशान देखा है

हमने दिल पर निशान देखा है, उसने बस आसमान देखा है, जब कभी बाम पर कहीं पहुंचे, पहले बस  पायदान देखा है, हर मकीं छोड़ कर चला जाये, इतना ख़ाली मकान देखा है..... उंसियत कोई भी नहीं रखता, हमने सारा जहान देखा है... अपने गुंचों से दुश्मनी रख्खे ऐसा भी बाग़बान देखा है... पहले खुर्शीद की जलन देखी, तब कहीं सायबान देखा है... #उर्मिलामाधव... 3.7.2015

ख़ुश नहीं हैं

आपको मालूम है, हम कुछ नहीं हैं, आप में शामिल हुए पर ख़ुश नहीं हैं देखते रहते हैं, ख़ुशियों को सहम कर, हम समझते हैं ग़मों को, बुत  नहीं हैं। हमने ख़ुद को ख़ूब देखा है, अलग से, हम बज़ाहिर ठीक हैं, साबुत नहीं हैं।। उर्मिला माधव 2.7.2020