डर रही हूँ
खुली बग़ावत है ज़िन्दगी से,
मैं धड़कनों से मुकर रही हूं,
के अब न भाती हैं सर्द आहें,
मैं सब दहानों से डर रही हूं,
यूँ रूह कहती है अब तड़प के,
हज़ारों सदियों से मर रही हूं,
ये जिस्म जैसे लहद हो मेरी,
इसी के अंदर बिखर रही हूं,
उर्मिला माधव
25.7.2018
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