इक ज़ख़ीरा
इक ज़ख़ीरा मुश्किलों का दिल पे है रख्खा हुआ,
और हर इक बज़्म में इस बात का चर्चा हुआ,
हम भी ये दिन मुश्किलों से देख पाये हैं हुज़ूर,
तीरगी काफ़ूर थी और चांद भी हंसता हुआ,
हम अंधेरी रात के किस्से सुना सकते थे बस,
आज देखा रात का कुछ रंग सा बदला हुआ,
हमको सावन से मुहब्बत सी हुई है दफ़अतन,
गोकि अपना बिजलियों से दर्द का सौदा हुआ,
उर्मिला माधव
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