इज़ाफ़ा हो रहा है
क्यूं तमाशों में इज़ाफ़ा हो रहा है,
आदमी अपना अदब क्यूं खो रहा है।
इन नई नस्लों को क्या मिल पाएगा,
जिसको देखो वो तड़प कर रो रहा है।
क्या वो सोचे जिसकी दुनियां जल गई
ख़ून के छींटे,मुसलसल धो रहा है।
एक मुश्किल से जो छूटे गर कोई,
बीज दूजा ज़ह्र के फिर बो रहा है।
किस तरह पहुंचेंगी ये चीखें कहीं,
कान मूंदे हर पड़ोसी सो रहा है।
क्या नज़ारा और मुस्तक़बिल में हो,
जो बुरा है वो बुरा ही तो रहा है।
उर्मिला माधव,
13.7.2017
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