आसमां बन कर चले
इस ज़मी पर आसमां बन कर चले,
हम अकेले "कारवां"बन कर चले...
जो भी जी में आगया सच कह दिया,
अपने हर्फ़ों की जुबां बन कर चले,
यूँ समझ लो मील का पत्थर भी ख़ुद,
और ख़ुद ही पासबां बन कर चले,
मर्सिया भी ख़ुद-ब-ख़ुद ही पढ़ लिया,
ख़ुद-ब-ख़ुद ही नौहा ख्वां बन कर चले,
अपने क़दमों को कहीं रोका नहीं,
बा अदब वक़्ते रवां बन कर चले...
उर्मिला माधव...
21.7.2016
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