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Showing posts from April, 2017
घर कितना वीरान तो देख, क्या-क्या है,सामान तो देख, क्या पैमाना सही ग़लत का, अय दुनियां मीज़ान तो देख, जिस पर बोझा लाद रहा है, उसकी पहले जान तो देख, लिए आईना फिरता है तो, ख़ुद अपना ईमान तो देख, किसे सज़ा दी,किसको बख्शा, भला-बुरा ...इनसान तो देख, फ़िक़्र करे है दुनियां भर की, पहले .....हिंदुस्तान तो देख, उर्मिला माधव, 23.3.2017
समेटना, बिखरी हुई पत्तियों का, सरल नहीं, तोडना, टूटी हुयी टहनियों का, बहुत सरल है, पर आवाज़ का क्या करोगे? जो तोड़ने से हुई, पर हाँ, किसीके टूटने-जुड़ने से, कोई आहत नहीं होता, ये निजता की बात है, कभी किसी वृक्ष की छाया, भली लगती है, क्यूंकि उसमें हरियाली जो है, कभी किसी वृक्ष का खड़े रहना, भी सालता है, दूषित मन को, क्यूंकि सूखा हुआ वृक्ष किस काम का? पत्तियां तो सूख गईं, और उनका हरा होना मुमकिन नहीं, अब मुक्त आकाश, में जीवन है क्यूंकि क्षितिज के पार भी कोहरा हो सकता है, पर अंतर्दृष्टि चाहिए होती है, एक गहरी अंतर्दृष्टि, पंछियों को आज़ाद रहना भाता है, बंदी होकर कोई सृजन नहीं होता... सिर्फ रुदन होता है, और रोना कौन चाहता है....?? पर तुम्हें कौन समझाए.....?? उर्मिला माधव..
हमको लगता है कि तुम एक चाँद हो, चाँद ही तो दूर रहता है सनम से  सच, कसम से, चांदनी आती है मेरे घर के दर तक, तुम कहीं आजाओ तो मर जाएँ धम से  सच, कसम से, शर्म की पाजेब पांवों में है मेरे हो सके तो आके तुम मिल जाओ हमसे सच, कसम से, एक दिन दुनियां से हम उठ जायेंगे बस, बाद उसके रोओगे तुम दर्द-ओ-ग़म से सच कसम से, वो तुम्हारे आंसुओं से कम रहेगी, जो सहन में होगी बारिश,खूब,झम से सच कसम से, अब भी तुम आ जाओ अब भी वक़्त है, सांस रुक जायेगी इक दिन एकदम से सच,कसम से, उर्मिला माधव... 16.3.2016
सुब्ह उठना है काम करना है, वक़्त का एहतराम करना है, जब गिनी जाती यौम-ए-पैदाइश, मौत का ही क़याम करना है, उठती-गिरती,हज़ार साँसों को, आख़िरी एक सलाम करना है, ज़िंदगी तेरे कुछ तकाज़े हैं, उम्र को तेरे नाम करना है, हमको दोज़ख़ हराम हो आख़िर, इसका भी इंतज़ाम करना है  उर्मिला माधव।।
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Urmila Madhav Mar 31, 2017 1:46am शब्दों का अप्रतिम सौन्दर्य, क्या लिखा है, प्रिय, तुम्हारी उँगलियों ने, एक शब्द, सुगंध, अनुपम है, आभासित है किन्तु, परिलक्षित नहीं, ये कोई प्रीत है क्या ? यदि हाँ, तो उजागर हो, अन्यथा, जीवन में, एक दिन निश्चित हुआ है म्रत्यु का, मर्यादाओं का, एक अविदित मार्ग, दुरूह मार्ग, चलते हुए सब, संभलते हुए सब, स्वयं को छलते हुए सब, अंत हीन, मार्ग.. और अंतहीन वियोग, उर्मिला माधव,
तुमको पसंद हमने किया तुमने क्या किया?? दिल को बुलंद हमने किया तुमने क्या किया?? तनहाइयों में रोया किये.......ज़ार-ज़ार खूब, दिल दर्द मंद हमने किया तुमने क्या किया?? तुमने तवज्जो हम पे किसी तौर जब न की, दिल दस्त-बंद हमने किया तुमने क्या किया ?? उर्मिला माधव ... 31.3.2017
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ख़्वाब में नहीं, देखती हूँ मैं तुम्हें इन सूखते हुए दरख्तों में, तुम सुब्ह की धूप से हो, कुछ बसंती रूप से हो, इन फ़ज़ाओं में तुम्हारी खुशबुएँ,बिखरी हुईं हैं, ज़र्द पत्ते इन दरख्तों की हदें कहते हुए, तुम मगर इनमें नहीं हो, सब्ज़ पत्तों में लिखा है, रंग तुम्हारा, तुम हरे परचम से लगते हो मुझे, ख़ूब हो पर कम से लगते हो मुझे, इक धुंधलके में भी तुमको देखती हूँ, तुम सलेटी रंग में लिपटे हुए से, रात की गहरी सियाही ला रहे हो, जब सुब्ह होगी तो पत्ते फिर गिरेंगे, फिर सुब्ह की धूप सा तुमको, निकलना है यहाँ, और तुम इक ज़र्द परचम से लगोगे फिर मुझे, और फिर इस धूप को देखेगा कौन? उर्मिला माधव.. 1.4.2017
दिल मेरा लग नही रहा हरगिज़, कोई दिल पर मिरे हुआ क़ाबिज़, ख़ुद ही ख़ुद को मनाती रहती हूं, भीग जाते हैं हर दफ़ा आरिज़, नज़्र अंदाज़ लाख़ करती रहूँ, दिल मुझे रोज़ कर रहा आजिज़ उर्मिला माधव, 1.4.2017
है चर्चा उस मस्ताने का,जो अनजाने में दौड़ गया, एक दश्त-ओ-जुनूं का दीवाना,लो वीराने में दौड़ गया, क्या मानी उसको वहशत से,अनजान रहा जो दहशत से, वीरानी-ए-दिल जब हावी हुआ तो मैख़ाने में दौड़ गया, उर्मिला माधव, 2.4.2017
Apr 03, 2017 12:31pm भावनाएं होगईँ, कुत्सित प्रणय की, आस्था के पांव पीले पड़ गए, वृक्ष की शाखाएं विचलित हो गईं और हरे पत्ते सिकुड़ कर झड़ गए, एक मुट्ठी छांव भी मिलने न पाई, और पथिक अविराम गति से लड़ गए, अनवरत ही आज कृन्दन चल रहा, कंटकों के जाल अविरल गड़ गए, होगया दूषित विषम, वातावरण, हर हृदय के घाव इतने सड़ गए... उर्मिला माधव, 3.4.2017
अब मेरा अपना कोई रिश्ता नहीं, है भी तो वो ख़ास कुछ अच्छा नही, हम अगर खूं भी बहा दें प्यार में, वो किसीको ख़ास कुछ लगता नहीं, उर्मिला माधव, 5.4.2017
सुनसान दुपहरी, कुछ सूखे,कुछ हरे, पत्तों वाले पेड़, बहती हुई बयार, और ये झूमती डालियां, घास चरती हुई बकरियां, इक्का-दुक्का यात्री, नीरवता को भंग करती, चहलकदमियाँ, घाघरा,चुन्नी,चोली, हरी चूड़ियों वाली औरतें, आपस में बतियाती हुई, कजरी की शादी पर चर्चा, कितने गहने चढ़े, उसका दूल्हा, उससे कुछ हेटा बताते हुए, वहीं अलग-थलग एक पेड़ के तने से पीठ टिका कर, उदास बैठी, लछमा,कुछ पढ़ी है, रुचि नहीं है उसकी इन बातों में, कैसा भी हो किसीका दूल्हा, उसे क्या करना, उसका परदेसी नहीं आया, ठंडी बयार तो झुलसाती है मन को, क्या करे गहनों का, इसी माह आने को कह गया, पर आया ही नहीं, इसी पेड़ की छांव में खड़े हुए, विदा किया उसको, एक ख़बर आई, रहा नहीं परदेसी, रोज़ यहीं सोचना, क्या हुआ होगा, कौन बताएगा उसे, केवल सोच, एक अंतहीन सोच, क्या हुआ होगा ? ?? उर्मिला माधव,
Apr 10, 2017 2:20pm ख़ाना-ए-हुस्न छांट के माशूक़ बन गए, दिल से उतर गए जो बहुत ख़ूब बन गए, अव्वल तो बात ये के तमाशा बहाल था, ख़ामोश हम खड़े थे कड़ी धूप बन गए,
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एक नज़्म।।। सामने ये चिलचिलाती धूप है,? या तुम्हारा छद्म वेशी रूप है ? बस इसी जंगल में तुमको देखती हूँ, ख़ुश्क पत्तों को सदायें भेजती हूँ, जब हवा बनकर गुज़रते हो यहाँ से, धीमी सी आवाज़ आती है वहां से, सब के सब इसको बगीचा कह रहे हैं, सबने मिलके इसको सींचा कह रहे हैं, वो जो एक झीना सा पर्दा बीच में है, बस के एक परदेस इसकी सीध में है, धूप में कुर्सी पै सर को टेकती हूँ, और उसी परदे से तुमको देखती हूँ, इसलिए इस धूप से नाता रहा है, तुमको सूरज छू के जो आता रहा है, गर्मियों में ये झुलस कर डर गए हैं, शाख़ और पत्तों के रिश्ते मर गए हैं, मैं मगर तुमसे जुड़ी हूँ उम्र भर को, ढूँढती रहती हूँ,ख़ुद अपनी नज़र को....