सुब्ह उठना है काम करना है,
वक़्त का एहतराम करना है,
जब गिनी जाती यौम-ए-पैदाइश,
मौत का ही क़याम करना है,
उठती-गिरती,हज़ार साँसों को,
आख़िरी एक सलाम करना है,
ज़िंदगी तेरे कुछ तकाज़े हैं,
उम्र को तेरे नाम करना है,
हमको दोज़ख़ हराम हो आख़िर,
इसका भी इंतज़ाम करना है
उर्मिला माधव।।
वक़्त का एहतराम करना है,
जब गिनी जाती यौम-ए-पैदाइश,
मौत का ही क़याम करना है,
उठती-गिरती,हज़ार साँसों को,
आख़िरी एक सलाम करना है,
ज़िंदगी तेरे कुछ तकाज़े हैं,
उम्र को तेरे नाम करना है,
हमको दोज़ख़ हराम हो आख़िर,
इसका भी इंतज़ाम करना है
उर्मिला माधव।।
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