सुनसान दुपहरी,
कुछ सूखे,कुछ हरे,
पत्तों वाले पेड़,
बहती हुई बयार,
और ये झूमती डालियां,
घास चरती हुई बकरियां,
इक्का-दुक्का यात्री,
नीरवता को भंग करती,
चहलकदमियाँ,
घाघरा,चुन्नी,चोली,
हरी चूड़ियों वाली औरतें,
आपस में बतियाती हुई,
कजरी की शादी पर चर्चा,
कितने गहने चढ़े,
उसका दूल्हा, उससे कुछ हेटा
बताते हुए,
वहीं अलग-थलग
एक पेड़ के तने से
पीठ टिका कर,
उदास बैठी,
लछमा,कुछ पढ़ी है,
रुचि नहीं है उसकी इन बातों में,
कैसा भी हो किसीका दूल्हा,
उसे क्या करना,
उसका परदेसी नहीं आया,
ठंडी बयार तो झुलसाती है मन को,
क्या करे गहनों का,
इसी माह आने को कह गया,
पर आया ही नहीं,
इसी पेड़ की छांव में खड़े हुए,
विदा किया उसको,
एक ख़बर आई,
रहा नहीं परदेसी,
रोज़ यहीं सोचना,
क्या हुआ होगा,
कौन बताएगा उसे,
केवल सोच,
एक अंतहीन सोच,
क्या हुआ होगा ?
??
उर्मिला माधव,

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