एक नज़्म।।।
सामने ये चिलचिलाती धूप है,?
या तुम्हारा छद्म वेशी रूप है ?
बस इसी जंगल में तुमको देखती हूँ, ख़ुश्क पत्तों को सदायें भेजती हूँ, जब हवा बनकर गुज़रते हो यहाँ से, धीमी सी आवाज़ आती है वहां से, सब के सब इसको बगीचा कह रहे हैं, सबने मिलके इसको सींचा कह रहे हैं, वो जो एक झीना सा पर्दा बीच में है, बस के एक परदेस इसकी सीध में है, धूप में कुर्सी पै सर को टेकती हूँ, और उसी परदे से तुमको देखती हूँ, इसलिए इस धूप से नाता रहा है, तुमको सूरज छू के जो आता रहा है, गर्मियों में ये झुलस कर डर गए हैं, शाख़ और पत्तों के रिश्ते मर गए हैं, मैं मगर तुमसे जुड़ी हूँ उम्र भर को, ढूँढती रहती हूँ,ख़ुद अपनी नज़र को.... |
दास्तां कह रही हैं
हवाएं अजब दास्तां कह रही हैं, कहाँ से चली हैं, कहाँ बह रही हैं


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