भावनाएं होगईँ, कुत्सित प्रणय की,
आस्था के पांव पीले पड़ गए, वृक्ष की शाखाएं विचलित हो गईं और हरे पत्ते सिकुड़ कर झड़ गए, एक मुट्ठी छांव भी मिलने न पाई, और पथिक अविराम गति से लड़ गए, अनवरत ही आज कृन्दन चल रहा, कंटकों के जाल अविरल गड़ गए, होगया दूषित विषम, वातावरण, हर हृदय के घाव इतने सड़ गए... उर्मिला माधव, 3.4.2017 |
दास्तां कह रही हैं
हवाएं अजब दास्तां कह रही हैं, कहाँ से चली हैं, कहाँ बह रही हैं
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