समेटना,
बिखरी हुई पत्तियों का,
सरल नहीं,
तोडना,
टूटी हुयी टहनियों का,
बहुत सरल है,
पर आवाज़ का क्या करोगे?
जो तोड़ने से हुई,
पर हाँ,
किसीके टूटने-जुड़ने से,
कोई आहत नहीं होता,
ये निजता की बात है,
कभी किसी वृक्ष की छाया,
भली लगती है,
क्यूंकि उसमें हरियाली जो है,
कभी किसी वृक्ष का खड़े रहना,
भी सालता है,
दूषित मन को,
क्यूंकि सूखा हुआ वृक्ष
किस काम का?
पत्तियां तो सूख गईं,
और उनका हरा होना
मुमकिन नहीं,
अब मुक्त आकाश,
में जीवन है
क्यूंकि
क्षितिज के पार भी कोहरा हो सकता है,
पर अंतर्दृष्टि चाहिए होती है,
एक गहरी अंतर्दृष्टि,
पंछियों को आज़ाद रहना भाता है,
बंदी होकर कोई सृजन नहीं होता...
सिर्फ रुदन होता है,
और रोना कौन चाहता है....??
पर तुम्हें कौन समझाए.....??
उर्मिला माधव..
बिखरी हुई पत्तियों का,
सरल नहीं,
तोडना,
टूटी हुयी टहनियों का,
बहुत सरल है,
पर आवाज़ का क्या करोगे?
जो तोड़ने से हुई,
पर हाँ,
किसीके टूटने-जुड़ने से,
कोई आहत नहीं होता,
ये निजता की बात है,
कभी किसी वृक्ष की छाया,
भली लगती है,
क्यूंकि उसमें हरियाली जो है,
कभी किसी वृक्ष का खड़े रहना,
भी सालता है,
दूषित मन को,
क्यूंकि सूखा हुआ वृक्ष
किस काम का?
पत्तियां तो सूख गईं,
और उनका हरा होना
मुमकिन नहीं,
अब मुक्त आकाश,
में जीवन है
क्यूंकि
क्षितिज के पार भी कोहरा हो सकता है,
पर अंतर्दृष्टि चाहिए होती है,
एक गहरी अंतर्दृष्टि,
पंछियों को आज़ाद रहना भाता है,
बंदी होकर कोई सृजन नहीं होता...
सिर्फ रुदन होता है,
और रोना कौन चाहता है....??
पर तुम्हें कौन समझाए.....??
उर्मिला माधव..
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