एक मछली आगई तालाब में, गंदगी फैला गई कुल आब में, एक मछेरे की गज़ब जादूगरी जाने उसको क्या दिखाया ख़ाब में, फंस गई तो कट गई ये मानलो, आ गई कुछ इस तरह से ताब में, अब रक़ाबी में सजाई जायेगी, बाँट दी जाएगी हर अहबाब में, बेखबर थी यूँ भी होगा एक दिन, ज़िन्दगी बह जायेगी सैलाब में, उर्मिला माधव.. 30.6.2014...
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Showing posts from June, 2014
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मैं तो एक ज़िक्र भर ही करती हूँ, सबसे मिलने में अब भी डरती हूँ, किस क़दर कौन क्या सुना देगा, दिल ही दिल में बहुत सिहरती हूँ... ------------------------------ ----- main to bas zikr bhar hii kartii hun, sabse milne main ab bhii dartii hun, kis jagah kaun kyaa sunaa degaa, dil hii dil main bahut sihartii hun... उर्मिला माधव... 26.6.2014...
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तरही ग़ज़ल... ----------------- वक़्त का अंदाज़ जब बेहद नुकीला होगया, ज़िन्दगी का तर्जुमा ज़्यादः नशीला होगया, आंधियां ज़ोरों से आईं हाल कुछ ऐसा हुआ, ज़ह्र तूफानों में था बस जिस्म नीला होगया, बारहा हर ग़ाम पर कुछ इम्तिहां होते रहे, आँख बेशक़ ख़ुश्क है,दामन तो गीला होगया, जो शजर तनहा खडा है आज तक भी धूप में, उस शजर का आख़री पत्ता भी पीला होगया आगया बेसाख्ता लब पर तबस्सुम क्या कहें, यक़-ब-यक़ जब रेत का काफूर टीला होगया....
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आग में आग भड़का रहा दोस्तों, काम पानी का फिर क्या रहा दोस्तो?? आग,रूहानी हो,आग जिस्मानी हो, ज़ीस्त ही तो जली बारहा दोस्तो, ज़िन्दगी भर जले,मर के भी जल गए, खेल क़ुदरत का ये क्या रहा दोस्तो?? आशिक़ी में जले,जल गए वस्ल में, आदमी क्या सिला पा रहा दोस्तो?? रौशनी के लिए शम्मा रौशन करे, सिर्फ़ धोखा ही तो खा रहा दोस्तो.... उर्मिला माधव...
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नज़्म ------- जिंदा हूँ तो नज्रों में,----------------------zindaa hun to nazron main, बड़ी हुई तो फिक्रों में,--------------------------badii hui to fiqron main, मारी गई तो जिक्रों में,----------------------maarii gaii to zikron main, उठ कर जो मैं खड़ी हुई,-------------------uth kar jo main khadii huii, आँख पै सबके चढ़ी हुई,-----------------aankh pe sabke chadhii hui, पाँव रखा घर से बाहर,---------------paanv rakh aa ghar se baahar, सब बोले ढक ले चादर,--------------------sab bole,dhak le chaadar, अम्मा बोलीं,फ़ैशन छोड़,--------------ammaa boliin,faishion chhod, होश में आजा ठीक से ओढ़,-----------hosh main aajaa thiik se odh, बोले बाबू,जोड़म जोड़, ------------------------bole baabuu jodamjod, दिल पत्थर से डाला तोड़,-----------------dil daalaa paththar se tod, वक़्त बुरा,ये बात समझ,----------------waqt buraa ye baat samajh, है औरत की ज़ात,समझ,-------------------hai aurat kii zaat samajh, पल्ले पड़ा नहीं कुछ भाया,------palle padaa nahin kuchh bhaayaa, फिर भी मैंने,हुकुम बजाया,-----...
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मुश्किल से घबराना हमने नईं सीखा, बेबस हो,मुरझाना हमने नईं सीखा, अपनी क़श्ती पार भंवर से कर लेंगे, लहरों से डर जाना हमने नईं सीखा, साज़िश की बदबू तो हमको आती है, लानत घर भिजवाना हमने नईं सीखा, अपनी खातिर खूब ख़िलाफ़त देखी है, डर कर पीठ घुमाना हमने नईं सीखा, दरवाज़ों पर इस्तक़बाल लिखा है जी, मजमा रोज़ लगाना हमने नईं सीखा... उर्मिला माधव...7.6.2014...
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एक बार फिर..... ------------------- क़ब्र पर मिट्टी चढ़ाई जा रही है, लाश कुछ गहरी दबाई जा रही है, रेत मुट्ठी से फिसलती सी लगे यूँ, हाथ से निकली ख़ुदाई जा रही है, उफ़ पसीना आगया कैसा जबीं पर, ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही है, चश्म-ए-गिरियाँ में उतर कर देख लेंगे, किस तरफ़ ये रहनुमाई जा रही है, दोष पै सर को उठा कर चल रहे हैं, आँख लेकिन नईं उठाई जा रही है, ज़िन्दगी देकर हमें बख्शी है दोज़ख, यार को जन्नत दिखाई जा रही है, शोर मदफन से उठा है,फिर अचानक फिर कोई तुरवत सजाई जा रही है। उर्मिला माधव.. 5.8.2013
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कितनी हैरत है गिरा,सब्ज़,,,,,शजर देखा है, वक़्त-ए-मुश्किल में बहुत खूब क़हर देखा है, चश्म-ए-गिरियाँ का अँधेरा ही रहा आठ पहर, किस से ये कहते फ़क़त दर्द-ए-जिगर देखा है, यूँ तो नाज़ुक था,यही कहते सुने अहले नज़र, जम के पत्थर से लड़ा......ऐसा गुहर देखा है, घर बहुत जलते रहे,अब्र कहीं बरसा किया, ऐसा मंज़र भी कभी वक़्त-ए-सहर देखा है, दिल को होता ही नहीं इसका यकीं,कैसे कहें फिर भी ये कहते रहे लोग.....मगर देखा है, चढ़ते दरिया में भी रफ़्तार मुक़म्मल ही रही, हमने कश्ती को बिना खौफ़-ओ-ख़तर देखा है,
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इतना ज्यादह घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से कबके उतर गए होते इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते, इतनी लम्बी उम्र गुज़ारी,तलवारों की धारों पर, लफ्फाजों से डर जाते तो,जाने किधर गए होते एक तरफ बंदूकें दन-दन,एक तरफ ज़हरीला,गम डरने की आदत ग़र होती ,कितने सिहर गए होते, हम साहिल पर खड़े रहे और सैलाबों ने खेल किये, ग़र हम अपना रंग दिखाते,कितने जिगर गए होते,