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Showing posts from June, 2014
एक मछली आगई तालाब में, गंदगी फैला गई कुल आब में, एक मछेरे की  गज़ब जादूगरी जाने उसको क्या दिखाया ख़ाब में, फंस गई तो कट गई ये मानलो, आ गई कुछ इस तरह से ताब में, अब रक़ाबी में सजाई जायेगी, बाँट दी जाएगी हर अहबाब में, बेखबर थी यूँ भी होगा एक दिन, ज़िन्दगी बह जायेगी सैलाब में, उर्मिला माधव.. 30.6.2014...
मैं तो एक ज़िक्र भर ही करती हूँ, सबसे मिलने में अब भी डरती हूँ, किस क़दर कौन क्या सुना देगा, दिल ही दिल में बहुत सिहरती हूँ... ------------------------------ ----- main to bas zikr bhar hii kartii hun, sabse milne main ab bhii dartii hun, kis jagah kaun kyaa sunaa degaa, dil hii dil main bahut sihartii hun... उर्मिला माधव... 26.6.2014...
ख़ुद को थोड़ा बदल सको तो आधी रात चले आना, मेरी चाहत सिर्फ़ तुम्ही...हो खाली हाथ चले आना, उर्मिला माधव... 27.6.2014...
फिर वही किस्सा दुबारा होगया, दर्द से दिल पारा-पारा हो गया, हर घड़ी जो साथ मेरे था कभी, और की चाहत का मारा होगया, जो अना के साथ जीता था कभी, किस क़दर ये दिल बेचारा होगया, चाँद की मजमून सी थी ज़िन्दगी, अब महज़ टूटा सा तारा हो गया, सांस का चलना गनीमत जानियो, यूँ समझ लीजो गुज़ारा हो गया,
तरही ग़ज़ल... ----------------- वक़्त का अंदाज़ जब बेहद नुकीला होगया, ज़िन्दगी का तर्जुमा ज़्यादः नशीला होगया, आंधियां ज़ोरों से आईं हाल कुछ ऐसा हुआ, ज़ह्र तूफानों में था बस जिस्म नीला होगया, बारहा हर ग़ाम पर कुछ इम्तिहां होते रहे, आँख बेशक़ ख़ुश्क है,दामन तो गीला होगया, जो शजर तनहा खडा है आज तक भी धूप में, उस शजर का आख़री पत्ता भी पीला होगया आगया बेसाख्ता लब पर तबस्सुम क्या कहें, यक़-ब-यक़ जब रेत का काफूर टीला होगया....
आग में आग भड़का रहा दोस्तों, काम पानी का फिर क्या रहा दोस्तो?? आग,रूहानी हो,आग जिस्मानी हो, ज़ीस्त ही तो जली बारहा दोस्तो, ज़िन्दगी भर जले,मर के भी जल गए, खेल क़ुदरत का ये क्या रहा दोस्तो?? आशिक़ी में जले,जल गए वस्ल में, आदमी क्या सिला पा रहा दोस्तो?? रौशनी के लिए शम्मा रौशन करे, सिर्फ़ धोखा ही तो खा रहा दोस्तो.... उर्मिला माधव...
हम मुहब्बत में...वजीफ: ख्वार हैं, बस हम ही....हालात से लाचार हैं, उम्र भर तनख्वाह तक तो ठीक है, क्यूँ वजीफ: के फ़क़त..हक़ दार हैं??
अपनी आँखों का फ़क़त नूर बना कर रखलो, जाँविदा इश्क़ का.....दस्तूर बना कर रखलो, अच्छा रहने दो चलो छोड़दो अपनी सी करो, मुझको दिनरात का मजदूर बना कर रख लो... उर्मिला माधव...
हर सिम्त लुटेरे बैठे हैं, जागीर उजड़ने वाली है, ऐ परदानशीं अब आजाओ, तक़दीर बिगड़ने वाली है, तुम छोड़ गए हो उलझन में, मासूम मुहब्बत डरती है, इन आती जाती साँसों की, अब डोर बिछुड़ने वाली है।।...... उर्मिला माधव.
बदलियों में चाँद....गोरा लग रहा है, कोई अँग्रेज़न का...छोरा लग रहा है, किस क़दर बेदाग़.....इसका हुस्न है, दिलनशीं,शफ्फाक़,कोरा लग रहा है...
नज़्म -------   जिंदा हूँ तो नज्रों में,----------------------zindaa hun to nazron main, बड़ी हुई तो फिक्रों में,--------------------------badii hui to fiqron main, मारी गई तो जिक्रों में,----------------------maarii gaii to zikron main, उठ कर जो मैं खड़ी हुई,-------------------uth kar jo main khadii huii, आँख पै सबके चढ़ी हुई,-----------------aankh pe sabke chadhii hui, पाँव रखा घर से बाहर,---------------paanv rakh aa ghar se baahar, सब बोले ढक ले चादर,--------------------sab bole,dhak le chaadar, अम्मा बोलीं,फ़ैशन छोड़,--------------ammaa boliin,faishion chhod,   होश में आजा ठीक से ओढ़,-----------hosh main aajaa thiik se odh, बोले बाबू,जोड़म जोड़, ------------------------bole baabuu jodamjod, दिल पत्थर से डाला तोड़,-----------------dil daalaa paththar se tod, वक़्त बुरा,ये बात समझ,----------------waqt buraa ye baat samajh, है औरत की ज़ात,समझ,-------------------hai aurat kii zaat samajh, पल्ले पड़ा नहीं कुछ भाया,------palle padaa nahin kuchh bhaayaa, फिर भी मैंने,हुकुम बजाया,-----...
बड़ी मिन्नतों से तो सालों में आये, यही बात हर दम ख़यालों में आये, बहुत आरज़ू जिनके दीदार की थी, वो आये मगर,हंसने वालों में आये,
मुश्किल से घबराना हमने नईं सीखा, बेबस हो,मुरझाना हमने नईं सीखा,   अपनी क़श्ती पार भंवर से कर लेंगे, लहरों से डर जाना हमने नईं सीखा,   साज़िश की बदबू तो हमको आती है, लानत घर भिजवाना हमने नईं सीखा, अपनी खातिर खूब ख़िलाफ़त देखी है, डर कर पीठ घुमाना हमने नईं सीखा, दरवाज़ों पर इस्तक़बाल लिखा है जी, मजमा रोज़ लगाना हमने नईं सीखा... उर्मिला माधव...7.6.2014...
एक बार फिर..... ------------------- क़ब्र पर मिट्टी चढ़ाई जा रही है, लाश कुछ गहरी दबाई जा रही है, रेत मुट्ठी से फिसलती सी लगे यूँ, हाथ से निकली ख़ुदाई जा रही है, उफ़ पसीना आगया कैसा जबीं पर, ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही है, चश्म-ए-गिरियाँ में उतर कर देख लेंगे, किस तरफ़ ये रहनुमाई जा रही है, दोष पै सर को उठा कर चल रहे हैं, आँख लेकिन नईं उठाई जा रही है,   ज़िन्दगी देकर हमें बख्शी है दोज़ख, यार को जन्नत दिखाई जा रही है, शोर मदफन से उठा है,फिर अचानक   फिर कोई तुरवत सजाई जा रही है। उर्मिला माधव.. 5.8.2013
तुम बहुत मग़रूर हो तो मैं ग़मों से चूर हूँ... इस क़दर मशहूर हो तो मैं बहुत मजबूर हूँ, जा-ब-जा नज़रें घुमाना,हर जगह मिल जाउंगी, शह्र के तुम नूर हो तो मैं वफ़ा की हूर हूँ, ज़ीस्त की फेहरिस्त में हैं जाने कितने वाक़यात, मुख़्तसर ये है के लम्बे वक़्त से रंजूर हूँ,
बहुत मासूम चेहरों की....बड़ी लम्बी कहानी है, कभी सहमा सा भोलापन,कभी रोती जवानी है हज़ारों ग़ाम पीछे लौट कर..जब भी ज़रा देखा, उसी मासूमियत के हाथ......कोरी नातवानी है....
न बिजली है न पानी है, अजब सी नातवानी है... अगर कोई गाँव होता तो   नदी पर भी चले जाते, ये दिल्ली है सुनो भैय्ये, यही इसकी कहानी है, अरे सरकार जी सुनलो, अगर ये हाल रख्खोगे, अभी हैं आठ दिन बीते, बड़ी मुश्किल कहानी है, उर्मिला माधव..
ख़ासियत कुछ ख़ास अपनी है ज़रूर,वर्ना ये किस्से कहानी किसलिए?? खोजना लाज़िम है हम में हर कुसूर,वर्ना अपनी जिंदगानी किसलिए?? हो गया अब कब तलक बल खाओगे,ऐंठ कर मरना ज़रूरी है ही क्यूँ?? आप भी कुछ हादसे देखो ज़रूर,इतनी ज्यादा खींचा तानी किसलिए??
कितनी हैरत है गिरा,सब्ज़,,,,,शजर देखा है, वक़्त-ए-मुश्किल में बहुत खूब क़हर देखा है, चश्म-ए-गिरियाँ का अँधेरा ही रहा आठ पहर, किस से ये कहते फ़क़त दर्द-ए-जिगर देखा है, यूँ तो नाज़ुक था,यही कहते सुने अहले नज़र, जम के पत्थर से लड़ा......ऐसा गुहर देखा है, घर बहुत जलते रहे,अब्र कहीं बरसा किया, ऐसा मंज़र भी कभी वक़्त-ए-सहर देखा है, दिल को होता ही नहीं इसका यकीं,कैसे कहें फिर भी ये कहते रहे लोग.....मगर देखा है, चढ़ते दरिया में भी रफ़्तार मुक़म्मल ही रही, हमने कश्ती को बिना खौफ़-ओ-ख़तर देखा है,
इतना ज्यादह घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से कबके उतर गए होते इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते, इतनी लम्बी उम्र गुज़ारी,तलवारों की धारों पर, लफ्फाजों से डर जाते तो,जाने किधर गए होते एक तरफ बंदूकें दन-दन,एक तरफ ज़हरीला,गम डरने की आदत ग़र होती ,कितने सिहर गए होते, हम साहिल पर खड़े रहे और सैलाबों ने खेल किये, ग़र हम अपना रंग दिखाते,कितने जिगर गए होते,