एक बार फिर..... ------------------- क़ब्र पर मिट्टी चढ़ाई जा रही है, लाश कुछ गहरी दबाई जा रही है, रेत मुट्ठी से फिसलती सी लगे यूँ, हाथ से निकली ख़ुदाई जा रही है, उफ़ पसीना आगया कैसा जबीं पर, ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही है, चश्म-ए-गिरियाँ में उतर कर देख लेंगे, किस तरफ़ ये रहनुमाई जा रही है, दोष पै सर को उठा कर चल रहे हैं, आँख लेकिन नईं उठाई जा रही है, ज़िन्दगी देकर हमें बख्शी है दोज़ख, यार को जन्नत दिखाई जा रही है, शोर मदफन से उठा है,फिर अचानक फिर कोई तुरवत सजाई जा रही है। उर्मिला माधव.. 5.8.2013 |
दास्तां कह रही हैं
हवाएं अजब दास्तां कह रही हैं, कहाँ से चली हैं, कहाँ बह रही हैं
Comments
Post a Comment