इतना ज्यादह घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते,
ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से कबके उतर गए होते
इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को,
इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते,
इतनी लम्बी उम्र गुज़ारी,तलवारों की धारों पर,
लफ्फाजों से डर जाते तो,जाने किधर गए होते
एक तरफ बंदूकें दन-दन,एक तरफ ज़हरीला,गम
डरने की आदत ग़र होती ,कितने सिहर गए होते,
हम साहिल पर खड़े रहे और सैलाबों ने खेल किये,
ग़र हम अपना रंग दिखाते,कितने जिगर गए होते,
ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से कबके उतर गए होते
इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को,
इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते,
इतनी लम्बी उम्र गुज़ारी,तलवारों की धारों पर,
लफ्फाजों से डर जाते तो,जाने किधर गए होते
एक तरफ बंदूकें दन-दन,एक तरफ ज़हरीला,गम
डरने की आदत ग़र होती ,कितने सिहर गए होते,
हम साहिल पर खड़े रहे और सैलाबों ने खेल किये,
ग़र हम अपना रंग दिखाते,कितने जिगर गए होते,
Comments
Post a Comment