तरही ग़ज़ल...
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वक़्त का अंदाज़ जब बेहद नुकीला होगया,
ज़िन्दगी का तर्जुमा ज़्यादः नशीला होगया,

आंधियां ज़ोरों से आईं हाल कुछ ऐसा हुआ,
ज़ह्र तूफानों में था बस जिस्म नीला होगया,

बारहा हर ग़ाम पर कुछ इम्तिहां होते रहे,
आँख बेशक़ ख़ुश्क है,दामन तो गीला होगया,

जो शजर तनहा खडा है आज तक भी धूप में,
उस शजर का आख़री पत्ता भी पीला होगया

आगया बेसाख्ता लब पर तबस्सुम क्या कहें,
यक़-ब-यक़ जब रेत का काफूर टीला होगया....

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