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Showing posts from August, 2025

खड़े रहना

दोस्त के साथ तो खड़े रहना, पर गलत शख्स के परे रहना, बात अच्छी है कुछ यकीन रखो, धोखे बाज़ों से बस डरे रहना, जो भी जैसा है उसको रहने दो, सिर्फ नीयत से तुम,खरे रहना,  झूठ में कुछ भी दम नहीं होता, अपनी सच्चाई पर अड़े रहना, कुछ तो ऐसा भी काम करते हैं  पीछे लोगों के बस पड़े रहना..... उर्मिला माधव... 31.8.2014...

एहतराम किसका

तरही ग़ज़ल-- किस्सा सुना रहे हैं ये वक़्त-ए-शाम किसका, इस गुफ़्तगू में आख़िर उट्ठा है नाम किसका, नामा निगार बनके आया है आज क़ासिद, लाया है देखो ख़त में,किसको सलाम किसका, नीलाम हो रहे हैं जज़्बात हर किसी के बाज़ार में लगाया कब किसने दाम किसका? फ़िरकःपरस्त आक़ा क्या फैसला करेंगे, किस-किस तरह से होगा,जीना हराम किसका? हम जी रहे हैं अब तक ज़िंदादिली के दम पर, करना है जब सभी ख़ुद, फिर एहतराम किसका? उर्मिला माधव.. 30.8.2016

अंदाज़ा लग पाया है

अब तक मुझको ये अंदाज़ा लग पाया है, किसने मुझको झूठा नक्शा दिखलाया है, ज़ह्र के चश्मे ख़ास हवा में मिल जाते है, बैसाखी से कोई कहाँ तक चल पाया है? तय रहता है चार क़दम पर ठोकर खाना, गिरने वाला जगह-जगह पर चिल्लाया है, हम वैसे भी अपनी दुनियां में रहते हैं,

कासा नहीं रखती

ज़रूरतमंद हूँ लेकिन कोई कासा नही रखती, इरादा जो भी रखती हूं कभी आधा नहीं रखती, मेरी आवाज़ का हिस्सा फ़लक तक भी पहुंचता है, जो कहती हूँ बुलंदी से,ज़ुबाँ सादा नहीं रखती, मेरे खूँ में तो नाफ़रमानियाँ, शामिल नहीं हरगिज़, मगर इल्ज़ाम है सर पर, के ये वादा नहीं रखती, अभी कुछ ज़ख़्म रिसते हैं,अभी कुछ वक्त बाक़ी है, ये ग़म बहने का ज़रिया हैं तो मैं फ़ाहा नहीं रखती, मुझे भी क़ब्र तक ले जाएगी बादे सबा इक दिन इसी डर से मैं अपनी रूह पे साया नहीं रखती उर्मिला माधव, 30.8.2017

काग़ज़ किताब वाले

रुतबा दिखा रहे हैं,इल्म-ओ-ख़िताब वाले, हैरत में पड़ गए हैं,इज़्ज़त के बाब वाले, कितनी मुख़ालफ़त है, आए हुजूम लेकर, आंखें मिला रहे हैं, ईमान-ओ- ख़ाब वाले, जज़्बात मांगती है, हर्फ़-ओ-अदब की दुनियां, गिनती सिखा रहे हैं,काग़ज़ किताब वाले, दावा ही कब किया है,फ़नकार हम हैं यारब, फिर भी सवाल लेकर,आए हिसाब वाले, सबको है ये तआज्जुब,ज़िंदा हैं हम अभी तक, तूफां से लड़ सके हैं, बस इज़तराब वाले बाद-ए-सबा में हर सू कीलें उछल रही हैं, सूली से कब डरे हैं , ईसा की ताब वाले, उर्मिला माधव,

क्यों मिले हो तुम

यक़बारगी तो ग़म हुआ कि क्यों मिले हो तुम, फिर यूँ लगा कि ज़िन्दगी के सिलसिले हो तुम, तूफां में घिर के चल रही थी, उम्रे ना तमाम, बस ऐन उसके तौर ही के इक गिले हो तुम, अच्छे बुरे हो जैसे भी सब ठीक ही तो है, अपनी किसी भी ज़िद से भला कब हिले हो तुम, उर्मिला माधव

आईना देखा बहुत

रात हमने आईना देखा बहुत, और तब अपने तईं सोचा बहुत, इस क़दर हावी हुईं कमज़ोरियाँ ? अपने जी पै तीर,ख़ुद साधा बहुत? पाँव पर है धूप,सर पर आफ़ताब, दिल अबस ही शबनमी,भीगा बहुत, रफ़्ता-रफ़्ता राह भी कट जायेगी, हमसफ़र क्यों बेवज्ह चाहा बहुत? अपनी सारी ख़ूबियों को भूल कर, यार का दर्ज़ा किया ऊंचा बहुत, उसके बिन जीना हुआ मंज़ूर अब, एक दामन जो कभी थामा बहुत, क्या हुआ जो रात भर सोये नहीं, पर सहर में ख़ुद को तो पाया बहुत... #उर्मिलामाधव, 26.8.2015..

देख लूं क्या

इक ज़रासा,रुख़ बदल कर देख लूं क्या, फिर तुम्हारे साथ चल कर देख लूं क्या? आंधियों का ज़ोर तो है मंज़िलों तक, फिर ज़रा गिर कर संम्भल कर देख लूँ क्या? ज़िंदगी का तो चलन हरदम वही है, फिर नए सांचे में ढल कर देख लूँ क्या ? छा गए आ कर अंधेरे रूह पर भी, फिर ज़रा ख़ुद से निकल कर देख लूँ क्या? उर्मिला माधव

जज़्बात का सौदा

किसलिए जज़्बात का सौदा करूँ, झूठ से भी कब तलक बहला करूँ, जो मेरी बुनियाद का हिस्सा नही, उसपे नीयत किस लिए ज़ाया करूँ,   यूँ भी तो तनहा है हर इक आदमी, बे-सबब ही इतना क्यूँ सोचा करूँ, कौन किसका हो सका है उम्र भर, कौन से हक़ से भला दावा करूँ, कोई भी हो,ग़म ही दे कर जाएगा, जानके ग़म किसलिए ओढ़ा करूँ   जब अनल हक़ पै टिकी है ज़िन्दगी, दर-ब-दर फिर किसलिए घूमा करूँ....  उर्मिला माधव ....

ख़ास मुस्तक़बिल

कभी शेर-ओ-सुखन अपना कभी नगमा सुनाया है, असल में इन तरीकों से ब-मुश्किल ग़म छुपाया है, रखा पास-ए-अदब मैंने,सभी अहबाब की खातिर, कलेजा देख लो मेरा,....नशेमन तक जलाया है, हज़ारों रंग देखे हैं मेरी नज़रों ने घबरा कर, मगर दिल ने मुझे जबरन बहकने से बचाया है... अजब ये दोगली दुनियां,ग़ज़ब है दिल का भोला पन बहुत कुछ फैसले करके ........क़दम पीछे हटाया है... किसीके साथ क्या चलना,मैं तनहा ही भली हूँ बस ये मेरा ख़ास मुस्तक़बिल है .....मैंने ख़ुद बनाया है।।। #उर्मिलामाधव.... 24.8.2015...

दिल से दिल मिलाना क्या

छोड़ दो दिल से दिल मिलाना क्या ? अब किसी को भी आज़माना क्या ? जो हुआ उसको ख़ूब होने दो, बेवज्ह अपना दिल दुखाना क्या ? तयशुदा बात ही तो गुजरी है, इसलिए यूँ भी अचकचाना क्या? अपने मुंह से कहो,"मुबारक हो" अश्क आँखों में झिलमिलाना क्या? किस क़दर हादसात झेले हैं, इस तरह आज डगमगाना क्या? उर्मिला माधव..

एक बहुत ख़ाली सड़क

एक नज़्म एक बहुत ख़ाली सड़क प आंख से ज़्यादा नहीं, इक ज़ुबाँ ख़ामोश हर पल चीख से लड़ती हुई, इक अजब वहशत सी तारी सोज़-ए-पिन्हानी में ग़र्क़,  पर कभी देखा नहीं उस ज़र्द पेशानी पे दर्द चार सू खामोशियों का शोर सा उठता हुआ, एक तन्हा दिल ग़मों की भीड़ से लड़ता हुआ, कितनी लंबी चुप्पियों का हौसला रखते हुए, लब तबस्सुम का मुलम्मा ख़ूबियों से ओढ़ कर, ख़ुद ब ख़ुद ही अपने हाथों,अपने दिल को तोड़ कर, रोज़ उसको आते-जाते देखते रहना है बस .... उर्मिला माधव,

अब नहीं जाने के हम

रास्ता बदला है हमने, अब नहीं आने के हम, पहले जाते थे कहीं, पर अब नहीं जाने के हम.. अब जहां की रौशनी से मुत्मइन हर्गिज़ नहीं, क्या सबब है ये ज़ुबाँ तक बस नहीं लाने के हम.. कब से गिनती कर रहे हैं ज़िन्दगी की चढ़ उतर, अब नहीं ख़ाहिश कोई और कुछ नहीं पाने के हम.. अब न कुछ भी फ़र्क़ है, रोने या हंसने का हमें, झूटी कसमों को बिरादर अब नहीं खाने के हम.. इक करीमी ने तुम्हारी अब तलक ज़िंदा रखा, तेरे दर को छोड़ कर भी अब नहीं जाने के हम... उर्मिला माधव

पूछ रहे हैं

कितने सारे सवाल पूछ रहे हैं... दोस्त सब मेरा हाल पूछ रहे हैं, पहले तुम अश्कबर न होते थे !! कैसे गुज़रे हैं साल ...पूछ रहे हैं, किसने हालत तुम्हारी ये की है?? किसका वो था जमाल पूछ रहे हैं, हर समय रंजबर क्यूँ लगते हो ?? क्या है मुझको मलाल पूछ रहे हैं?? उर्मिला माधव... 14.8.2013

क्या तरीक़ा है बता

महफ़िल-ए-शायरी की फिल्बदीह में कहे गए अशआर ------- क्या तरीका है बता तुझको मनाने के लिए, कुछ कसर बाकी न होगी तुझको पाने के लिए, अपनी सारी ज़िन्दगी मिट जाए इसका गम नहीं, तुझको पर मोहलत न देंगे दूर जाने के लिए , उम्र भर रूठा रहा है एक पल को मान जा, कुछ न कुछ तो चाहिए है,मुस्कुराने के लिए, रूठ जाने से हमारा दम निकल गर जाएगा, कौन फिर आएगा तुझसे दिल लगाने के लिए, यूँ तो होंगे हम हमेशा ज़िन्दगी के बाद भी, कुछ नहीं होगा मगर फिर आजमाने के लिए,  तेरी आमद के लिए चल जान ही कुर्बान है, कब्र पर तो आएगा चादर चढाने के लिए, वो समां मदफन का होगा ये समझ ले बे-खबर, तुझको रोना भी पड़ेगा,मुंह दिखाने के लिए... कर चरागाँ क़ब्र को या मार ठोकर लौट जा, कोई तो आ जाएगा शम्मा जलाने के लिए .... #उर्मिलामाधव... 9.8.2015...

खल सी गई सुनो

ये बात अब तुम्हारी खल सी गई सुनो,  अलफ़ाज़ की कटारी चल सी गई सुनो,  आंसू फ़क़त बने हैं,......ग़ज़लों के वास्ते ?  तबियत ही अब हमारी ढल सी गई सुनो,  लिख्खा है मेरे दिल पै जो तुमने था लिखा क्या तुम समझ रहे हो टल सी गई,सुनो,  देती रहेगी मुझको, तकलीफ़ उम्र भर  कालिख ही मेरे दिल पै मल सी गई सुनो,  सदियाँ गुज़र गईं हैं मिरे ग़म की शाम को,  लगता है मुझको जैसे कल सी गई सुनो.... #उर्मिलामाधव... 7.8.2015

अब कलम से आग लगती ही कहां है

अब कलम से आग लगती ही कहाँ है, आग का मक़सद तो हर इक आशियाँ है, ज़िन्दगी ज़िंदादिली है, सच है क्या ये ? कोई बतलाएगा इसमें क्या निहां है? क्या कोई मज़हब अभी बाक़ी रहा, क्यों फ़ना होता है जो इक कारवां है? वो भी राही क़त्ल कर डाले गए सब, जिनकी पाकीज़ा ज़ुबाँ, अम्न-ओ-अमां है, इसको किन नज़रों से देखा जाएगा अब? ये जो मक़तल से गया गुज़रा समां है, उर्मिला माधव,

कितनी सदियां गुज़ार दीं मैने

कितनी सदियां गुज़ार दीं मैंने, अपनी खुशियां भी हार दीं मैंने।। रु-ब-रु आए वो अदू की तरह, जिनको खुशियां उधार दीं मैंने।। दिल पे इक वाक़या गराँ गुज़रा, ख़्वाहिशें उसपे वार दीं मैंने।। कोई वादा वफ़ा हुआ न हुआ, सर से कसमें बुहार दीं मैंने।। रोते-रोते थकन सी होने लगी, फिर ये पलकें उतार दीं मैंने।। उर्मिला माधव...