अंदाज़ा लग पाया है
अब तक मुझको ये अंदाज़ा लग पाया है,
किसने मुझको झूठा नक्शा दिखलाया है,
ज़ह्र के चश्मे ख़ास हवा में मिल जाते है,
बैसाखी से कोई कहाँ तक चल पाया है?
तय रहता है चार क़दम पर ठोकर खाना,
गिरने वाला जगह-जगह पर चिल्लाया है,
हम वैसे भी अपनी दुनियां में रहते हैं,
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