क्यों मिले हो तुम
यक़बारगी तो ग़म हुआ कि क्यों मिले हो तुम,
फिर यूँ लगा कि ज़िन्दगी के सिलसिले हो तुम,
तूफां में घिर के चल रही थी, उम्रे ना तमाम,
बस ऐन उसके तौर ही के इक गिले हो तुम,
अच्छे बुरे हो जैसे भी सब ठीक ही तो है,
अपनी किसी भी ज़िद से भला कब हिले हो तुम,
उर्मिला माधव
Comments
Post a Comment