तूफ़ानों से रोज़ मुक़ाबिल होते हैं, हमको इसके फ़ख़्र भी हासिल होते हैं।
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Showing posts from July, 2020
आसमां बन कर चले
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इस ज़मी पर आसमां बन कर चले, हम अकेले "कारवां"बन कर चले... जो भी जी में आगया सच कह दिया, अपने हर्फ़ों की जुबां बन कर चले, यूँ समझ लो मील का पत्थर भी ख़ुद, और ख़ुद ही पासबां बन कर चले, मर्सिया भी ख़ुद-ब-ख़ुद ही पढ़ लिया, ख़ुद-ब-ख़ुद ही नौहा ख्वां बन कर चले, अपने क़दमों को कहीं रोका नहीं, बा अदब वक़्ते रवां बन कर चले... उर्मिला माधव... 21.7.2016
जुदा रख्खा गया
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ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा बिलकुल जुदा रख्खा गया, आदमी का आदमी से सिलसिला रख्खा गया, ज़ीस्त में कुछ इस तरह रंगीनियाँ रख्खी गईं, जिसमें इंसानों को हरदम मुब्तिला रख्खा गया, बुत बनाया पथ्थरों से और फिर दैर-ओ-हरम, सर-ब-सजदा होने को नाम-ए-खुदा रख्खा गया, फिर अदालत भी बनी सब पर हुकूमत के लिए, पंडितों मुल्लाओं को तब नाखुदा रख्खा गया, ज़िन्दगी और मौत के जलवों से है ये क़ायनात, इन्तेहा का नाम तब फिर इब्तेदा रख्खा गया... ---------------------------------------------------------- zindagii ka falsafaa,bilkul judaa rakhkhaa gayaa, aadmii kaa aadmii se, silsilaa rakhkhaa gayaa zeest main kuchh is tarah rangiiniyaan rakhkhii gaiin, jismain insaanon ko hardam,mubtilaa rakhkhaa gayaa, but banaayaa paththaron se or phir dair-o-haram, sir-ba-sajdaa hone ko naam-e-khudaa rakhkhaa gayaa, phir adaalat bhii banii sab par hukuumat ke liye, panditon,mullaaon ko tab naakhudaa rakhkhaa gayaa, zindaghii or maut ke jalwon se hai ye qaaynaat, intehaa ka naam tab phir intehaa rakhkhaa gayaa... #उर्मिलामाधव... 16.7.2015...
मुहब्बत है
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तू मेरी आख़री मुहब्बत है, ज़िन्दगी तू है,तू इबादत है, रु ब रु हो मिरी निगाहों के, तुझको छू लूँ अज़ीम शिद्दत है, मेरी ख़ाहिश हैं,तेरे रूह-ओ-जिगर, कब तेरा जिस्म मेरी चाहत है ? मुझपे क़ाबिज़ है तेरी हुस्न-ए-नज़र, तुझको देखूं ये मेरी आदत है, तू भी छुप जाए है कभी मुझ से, ये तेरी ख़ास इक शरारत है, तुझको देखे जो ग़ैर नज़्र कोई, फिर तो उस शख़्स से बगावत है.. उर्मिला माधव,
अजब ज़ंजीर है
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जो तुम्हारी ख़ास इक तस्वीर है, वो मेरे दिल की अजब ज़ंजीर है, वो मुझे अपनी सी लगती है सुनो, उसकी सीरत इन्तेहाई शीर है, बिन तुम्हारे दिल बहुत बेचैन था, ये महज़ बिछड़े समय की पीर है, रात दिन बाबत तुम्हारे सोचना, क्यूँ मेरे दिल पै रखी शमशीर है, लौट कर आना है उनको या नहीं, क्या ख़बर है क्या मेरी तक़दीर है,... #उर्मिलामाधव... 11.7.2015
चल तो रही हूँ मैं
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देहल से अपने घर की निकल तो रही हूँ मैं, शाना- ब-शाना आपके चल तो रही हूँ मैं, शमशीर-ओ-तीर लेके भला क्या करोगे तुम? तंज़-ओ-गुरूर देख के जल तो रही हूँ मैं, बज़्म-ए-जहाँ में आई हूँ पर बेख़बर् नही, अपने ही ग़म में रोके संभल तो रही हूँ मैं, अब तज़किरा करूँ भी किसी ग़ैर पै तो क्यों, आब-ओ-हवा के सांचे में ढल तो रही हूँ मैं, मेरी मुख़ालफ़त में हवा तक खिलाफ है, बे-फ़िक़्र होके फिर भी टहल तो रही हूँ मैं... #उर्मिलामाधव... 10.7.2016
सुब्ह शाम होते हैं
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हादसे सुब्ह-ओ-शाम होते हैं, रोज़.....रिश्ते तमाम होते हैं, अपने अखलाक़ पे,नज़र ही नहीं, दाग़........लोगों के नाम होते हैं, जो भी चाहा जुबां से कह डाला, और तब क़त्ल-ए-आम होते हैं, ये जो मजमा लगाया करते हैं, इनके...लफ़्ज़ों के दाम होते हैं, जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर, उनको....झुकके सलाम होते हैं, ================= hhadse subh-0-shaam hote hain, roz......rishte tamaam hote hain, apne akhlaaq pe nazar hi nahin, daagh logon ke naam hote hain, jo bhi aaya zubaan se kah daalaa, or tab........qatl-e-aam hote hain, jo ye majmaa lagaaya karte hain, inke.....lafzon ke daam hote hain, jo hain dil se dimaagh se shaatir, unko...jhuk ke salaam hote hain.... Urmila Madhav.. उर्मिला माधव.... 11.7.2016
काविश हज़ार करते हैं
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एक तसकीन तुझसे हासिल थी, इस यकीं पर भी हमको रंज हुआ, तुझको हम ज़िन्दगी नहीं कहते, इसमें मक़तल की क्या ज़रूरत है, जिसमें यलगार हर क़दम पर है, ख़ुद से हर दिन करार करते हैं, ऐसी दुनियां में हम नही रहते.. फिर भी इससे बड़ी मुहब्बत है, ये महज़ तल्ख़ सी हक़ीक़त है, इतनी काविश हज़ार करते हैं, फिर भी अहसास रोज़ मरते हैं, उर्मिला माधव
गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना
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गराँ दिल पे गुज़रा है,गुज़रा ज़माना, यूँ रेगे तपाँ में ........रहा आशियाना, हवाओं ने की उम्र भर ही ख़िलाफ़त, हुआ नेस्तोनाबूद ....अपना ठिकाना, हरे ज़ख़्म लेकर ..हुए दर-ब-दर के, शुरू कर दिया सबने..दामन बचाना, जो जज़्बात जम के हुए पत्थरों से, तो दफ़ना दिया हमने हंसना-हँसाना, जहां भर ने हमसे बहुत दिल्लगी की, कड़ा एक भी हमने फ़िकरा कहा ना, अजब कश्मकश से गुज़रते थे,फिर भी, न कुछ ज़िन्दगी से .......बनाया बहाना, नवाज़े गये .....सिर्फ़ तंज़-ओ-तबर से, बहुत सब्र अपना.......पड़ा आज़माना, बहुत चाहते हैं न सोचें हम इस पर, मगर दिल न भूले वो नज़रें चुराना, फ़क़त सच्ची ज़िद के,बहुत हम धनी थे, जो दिल ने न चाहा......न माना,न माना.... उर्मिला माधव, 11.7.2016
क़लम से आग लगती ही कहाँ है
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इसमें एक लफ्ज़ हम्द-ओ-सना काफ़िये से कुछ अलग है लेकिन मैं इसे किसी भी सूरत बदलूंगी नही --- अब कलम से आग लगती ही कहाँ है, आग का मक़सद तो हर इक आशियाँ है, ज़िन्दगी ज़िंदादिली है, सच है क्या ये ? कोई बतलाएगा इसमें क्या निहां है? क्या कोई मज़हब अभी बाक़ी रहा, क्यों फ़ना होता है जो इक कारवां है? वो भी राही क़त्ल कर डाले गए सब, जिनकी पाकीज़ा ज़ुबाँ, अम्न-ओ-अमां है, उनकी इज़्ज़त तो करो मरदूद लोगो, जेह्न में जिनके फ़क़त हम्द-ओ-सना है, इसको किन नज़रों से देखा जाएगा अब? ये जो मक़तल से गया गुज़रा समां है, उर्मिला माधव, 11.7.2017