काविश हज़ार करते हैं
एक तसकीन तुझसे हासिल थी,
इस यकीं पर भी हमको रंज हुआ,
तुझको हम ज़िन्दगी नहीं कहते,
इसमें मक़तल की क्या ज़रूरत है,
जिसमें यलगार हर क़दम पर है,
ख़ुद से हर दिन करार करते हैं,
ऐसी दुनियां में हम नही रहते..
फिर भी इससे बड़ी मुहब्बत है,
ये महज़ तल्ख़ सी हक़ीक़त है,
इतनी काविश हज़ार करते हैं,
फिर भी अहसास रोज़ मरते हैं,
उर्मिला माधव
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