क़लम से आग लगती ही कहाँ है

इसमें एक लफ्ज़ हम्द-ओ-सना काफ़िये से कुछ अलग है लेकिन मैं इसे किसी भी सूरत बदलूंगी नही
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अब कलम से आग लगती ही कहाँ है,
आग का मक़सद तो हर इक आशियाँ है,

ज़िन्दगी ज़िंदादिली है, सच है क्या ये ?
कोई बतलाएगा इसमें क्या निहां है?

क्या कोई मज़हब अभी बाक़ी रहा,
क्यों फ़ना होता है जो इक कारवां है?

वो भी राही क़त्ल कर डाले गए सब,
जिनकी पाकीज़ा ज़ुबाँ, अम्न-ओ-अमां है,

उनकी इज़्ज़त तो करो मरदूद लोगो,
जेह्न में जिनके फ़क़त हम्द-ओ-सना है,

इसको किन नज़रों से देखा जाएगा अब?
ये जो मक़तल से गया गुज़रा समां है,
उर्मिला माधव,
11.7.2017

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