लोग गफ़लत में बहुत उम्र बिता देते हैं, अपने जज़्बों को बहुत ख़ूब सज़ा देते हैं, हमसे दिलदार ही दुनियां में धुआं होके भी, खाक़ लेते हैं ज़मीं पर से, उड़ा देते हैं, ग़म ख़ुशी,मौत दुआ और हजार...
दिल मेरा लग नही रहा हरगिज़, कोई दिल पर मिरे हुआ क़ाबिज़, ख़ुद ही ख़ुद को मनाती रहती हूं, भीग जाते हैं हर दफ़ा आरिज़, नज़्र अंदाज़ लाख़ करती रहूँ, दिल मुझे रोज़ कर रहा आजिज़ उर्मिला माधव, 1.4.2017
ख़्वाब में नहीं, देखती हूँ मैं तुम्हें इन सूखते हुए दरख्तों में, तुम सुब्ह की धूप से हो, कुछ बसंती रूप से हो, इन फ़ज़ाओं में तुम्हारी खुशबुएँ,बिखरी हुईं हैं, ज़र्द पत्ते इन दरख्तो...
कुछ सितारे टांक दूं क्या आसमां में ? या कहीं चस्पां करूँ हुस्न-ए-जवां में ? ग़र कोई ख़ुशबू सुंघाई दे कहीं तो, प्यार की दुनिया लुटा दूं क्या जहां में ? खूबरू हैं सैकड़ों चेहरे ज़मीं प...
पुराने पन्नों से---- ------------------ बाँसुरी तुमको बनाना चाहती हूँ, अपने होठों से लगाना चाहती हूँ, और कोई गीत चाहे गा न पाऊँ, सिर्फ तुमको गुनगुनाना चाहती हूँ, स्वप्न जो भी मेरी आँखों ने सजा...
शब्दों का अप्रतिम सौन्दर्य, क्या लिखा है, प्रिय, तुम्हारी उँगलियों ने, एक शब्द, सुगंध, अनुपम है, आभासित है किन्तु, परिलक्षित नहीं, ये कोई प्रीत है क्या ? यदि हाँ, तो उजागर हो, अन्...
भीड़ में चलते हुए तनहा रही है ज़िन्दगी, क्या बताएं कब कहाँ,क्या क्या रही है ज़िन्दगी, जाने कितनी मुश्किलों से,रु-ब-होते रहे, थक गए हैं अब क़दम,घबरा रही है ज़िन्दगी, एक मिटटी का दिया त...
मेरे बेटे Madhuvan Rishiraj का कलाम.. पहले तौबा कर चुके थे, तब गए हम जाम तक ख़ुद कलम को तोड़ डाला आके उसके नाम तक बस तुम्हारी बू रहेगी और कुछ भी फिर नहीं जब अकेले जाएंगे हम ज़िन्दगी की शाम तक जि...
चार शेर.. पार करना है तुम्हें दरिया अगर, पाँव अपने, आब से ऊपर रखो मंज़िलों की दूरियां क्यों नापना, ख़ुद को बस गिरदाब से ऊपर रखो, नींद अपनी ख़्वाब में आ जाएगी, आंख लेकिन ख़ाब से ऊपर रख...
सुब्ह उठना है काम करना है, वक़्त का एहतराम करना है, जब गिनी जाती यौम-ए-पैदाइश, मौत का ही क़याम करना है, उठती-गिरती,हज़ार साँसों को, आख़िरी एक सलाम करना है, ज़िंदगी तेरे कुछ तकाज़े हैं, उ...
तू अगर चल पाए तो मैं आसमां तक ले चलूं, या तू ही बतला तुझे मैं किस जहां तक ले चलूं ये मआनी कुछ नहीं रस्ते कहां तक जाएंगे, तय तुझे करना है तुझको मैं कहाँ तक ले चलूं उर्मिला माधव
अभिषेक शुक्ला की ज़मीन पर. मैं जहां हूँ ......तू वहां हो के दिखा, एक शब भी ...चैन से सो के दिखा, लोग ......दरिया के किनारे हो लिए ख़ुश्क आंखों से कभी .रो के दिखा एक जखीरा,ज़ख़्म का सीने पे रख, और .लहू ...
चराग़ बुझने लगे,नींद अब कहाँ है बता, न जाने कब से मेरी आँख दे रही है सदा, कहाँ सुकून,कहाँ ज़ब्त औऱ ये ख़ामोशी, हयात कब से मुझे यूँ ही दे रही है सज़ा, क़यास-ए-कल्ब मेरा और अदा ज़माने की, ये त...
मुझको ग़म में ख़्वाब सजाना आता है, उल्फ़त का दस्तूर निभाना आता है, कोई साज़िश रचके रुसवा ख़ूब करे, आगे बढ़कर प्यार दिखाना आता है, फ़र्क़ समझना आजाता है पल भर में, हंस हंस के हर बात भुलान...
किस्सा सुना रहे हैं ये वक़्त-ए-शाम किसका, इस गुफ़्तगू में आख़िर उट्ठा है नाम किसका, नामा निगार बनके आया है आज क़ासिद, लाया है देखो ख़त में,किसको सलाम किसका, नीलाम हो रहे हैं जज़्बात ह...
कितनी हैरत से हमने देखा था, चूँकि एक जाल उसने फेंका था, साथ मैली सी एक औरत थी, उसकी हरगिज़ न कोई शोहरत थी, फिर भी उसको गले लगाया था, सब को अंदाज़ ये न भाया था, उसके पुरखों का एक बंगला थ...
उम्र भर को चाहता है,दिल सखावत आपकी ख़ास जो दरक़ार है वो बस इजाज़त आपकी, दिल बहुत मजबूत है पर इस तरह हरगिज़ नहीं, सर पै चढ़ कर बोलती है,जब अदावत आपकी, आप कब समझे कभी ये इश्क़ की बारीकियां,...
एक मतला दो शेर--- -------------------- बे-वज्ह इस जीस्त पे मरके भी क्या करते हैं हम, मरके जीने के इलावा.......और क्या करते हैं हम ?? चश्म-ए-गिरियाँ,टूटते दिल,और फ़क़त,तन्हाइयां, दर्द पीने के इलावा..........और क्या ...
ये तो क़िरदार की सफेदी है, इसको एक उम्र मैंने देदी है , गोकि हर सम्त ख़ून रिसता है, ज़िंदगी इस तरह से छेदी है, तह में चिंगारी इक सुलगती सी, बुझने वाली थी,.. फिर कुरेदी है, उर्मिला माधव ... 27.3...
ग़ज़ल----- शिकस्ता जिस्म लेकर ही जो चलना है तो चल लेंगे, अगर मुमकिन नहीं होगा तो दुनियाँ से निकल लेंगे, ज़रुरत क्या हमें सोचें कोई माज़ी ऑ मुस्तकबिल, दुआ के वास्ते हरगिज़ न हाथों में र...
मुझपे बस काबिज़ हुआ ही चाहती है, एक शै जो सिलसिला ही चाहती है, मैं खरी उतरूं अबस ,उम्मीद पर, वो मेरा हरदम बुरा ही चाहती है, मैं कड़े फिकरों से गुजरूँ,रात दिन, अपने हक में बस दुआ ही चा...
पारसाई की नुमाईश क्यों करो हो ? ख़ामियाँ ख़ासी नहीं तो क्यों डरो हो ? वो मुसलसल पीठ दिखलाता रहा है, ग़ैर की चाहत में नाहक़ क्यों मरो हो , उर्मिला माधव 24.3.2017
ख़्वाब तुम्हारे गढ़े ही कब थे, तुम इस दिल में,चढ़े ही कब थे ? ख़ुद खींची जो लकीर हम ने, उस से ज़्यादा बढ़े ही कब थे? तुम से प्यार का शिकवा कैसा', तुम ये लफ़्ज़, पढ़े ही कब थे ? उर्मिला माधव 26.10.2017
इस क़दर भारी पड़ा, दुनियां का हर मंज़र मुझे, दश्त सा लगने लगा मेरा ही अपना घर मुझे, हादसों की हर नफ़स बरपा हुईं सर गर्मियां, क्या बताऊँ किस क़दर लगने लगा था डर मुझे, गर ख़ुशी को वक़्त कम थ...
पारसाई की नुमाईश क्यों करो हो ? ख़ामियाँ ख़ासी नहीं तो क्यों डरो हो ? वो मुसलसल पीठ दिखलाता रहा है, ग़ैर की चाहत में नाहक़ क्यों मरो हो ? उर्मिला माधव.... 24.3.2015
समेटना, बिखरी हुई पत्तियों का, सरल नहीं, तोडना, टूटी हुयी टहनियों का, बहुत सरल है, पर आवाज़ का क्या करोगे? जो तोड़ने से हुई, पर हाँ, किसीके टूटने-जुड़ने से, कोई आहत नहीं होता, ये निजत...
साथ मेरे तुम ही तुम चलते रहे, ख़ाब बन कर आँख में पलते रहे, नींद में झपकाईं पलकें जो कभी, हाँ ये सच है,आँख तुम मलते रहे, है मुझे हैरत रहे तुम बे-वफ़ा !! और अदू के साथ भी चलते रहे! क्या सुक...
एक मतला --दो शेर... --------------------------- जिन दरख्तों की जड़ें,गहरी रही हैं, आँधियों के बाद भी....ठहरी रही हैं, शोर करतीं बिजलियाँ हैं जो उफ़क पर, ख़ुद शजर के साए में बहरी रही हैं, सब्ज़ दुनियाँ में ठुमक जा...
घर कितना वीरान तो देख, क्या-क्या है,सामान तो देख, क्या पैमाना सही ग़लत का, अय दुनियां मीज़ान तो देख, जिस पर बोझा लाद रहा है, उसकी पहले जान तो देख, लिए आईना फिरता है तो, ख़ुद अपना ईमान त...
उल्टे सीधे राग अलापा करते हैं, हम अपनी तन्हाई नापा करते हैं दबी-दबी एक बर्फ लबों पे जमी हुई, लोग तबस्सुम देखके स्यापा करते हैं, #उर्मिलामाधव... 22.3.2015
तुझको तेरा ग़ुरूर अच्छा है, मेरा अपना फ़ितूर अच्छा है कोई ख़्वाहिश नहीं मुहब्बत की, ऐसा लगता है दूर अच्छा है, उम्र गुज़री बहुत तजरिबों में, मुझको इतना ज़रूर अच्छा है.. Tujhko tera ghuruur achha hai, Mera apna fituur achha hai, Koii khwahish n...
एक मतला दो शेर.... क्या-क्या निहां है मुझमें ज़रा देखके बता, वक़्त-ए-गिराँ है मुझमें ,ज़रा देख के बता पैवंद से ढके हैं,बहुत ज़ख़्म और सुराग, अब भी निशाँ है मुझमें ज़रा देख के बता, उर्मिला ...
दिल पै मत ले यार----- ----------------------- जो चाहो तरकीब निकालो, किसी तरह दिल को बहला लो, अगर कोई कन्या मिल जाए, उसको बातों से फुसला लो, भले शेर चाहे जिसका हो, अपने नाम से उसको डालो, फिर देखो तुम रंग इश...
उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए दामन में सिर्फ खार हैं.....पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए , कुछ आरज़ू थी...कुछ थे इरादे बहुत बड़े , कुछ रा...
लाते नहीं हैं क़ुफ्र का चर्चा ज़ुबां तलक, मिलता नहीं था यार के दिल का निशां तलक, जज़्ब-ए-जुनूं में पूछते फिरते थे हाल हम, था होश तक नहीं,है मेरी हद कहाँ तलक, वहशत थी चश्म-ए-नम थी,दिल-ए-...
श्रद्धांजलि आदरणीय केदार नाथ सर को ... आते रहना, मैंने उसको जाते हुए कहा था, लेकिन वो जा रहा था, नहीं आने के क्रम में आभास तक न होने दिया, बस वो जा रहा था, जाते हुए हाथ हिला रहा था, बु...
बेवफ़ा जिस्म पे....कितना इतराओगे, इतनी खुद्दारी लेकर....किधर जाओगे, जिस्म किसका हुआ...इस जहां में कहो, हम भी मर जायेंगे,तुम भी मर जाओगे, एक रक्क़ासा बोली ये..........गिरते हुए, इब्न-ए-मरियम नह...
मेरे बेटे Madhuvan Rishiraj के लिखे, एक मतला २ शेर---- वो बाग़ की बातें करती है, फूलों की दुहाई देती है हमको इस दुनिया में खाली इक मौत दिखाई देती है ये गलियाँ सारी खाकशुदा, ये शहर है डूबा अश्क़ों मे...