पढ़े ही कब थे

ख़्वाब तुम्हारे गढ़े ही कब थे,
तुम इस दिल में,चढ़े ही कब थे ?

ख़ुद खींची जो लकीर हम ने,
उस से ज़्यादा बढ़े ही कब थे?

तुम से प्यार का शिकवा कैसा',
तुम ये लफ़्ज़, पढ़े ही कब थे ?
उर्मिला माधव
26.10.2017

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