तनहा रही है ज़िन्दगी

भीड़ में चलते हुए तनहा रही है ज़िन्दगी,
क्या बताएं कब कहाँ,क्या क्या रही है ज़िन्दगी,

जाने कितनी मुश्किलों से,रु-ब-होते रहे,
थक गए हैं अब क़दम,घबरा रही है ज़िन्दगी,

एक मिटटी का दिया तूफ़ान से लड़ता रहा,
बेखबर था क़ह्र से टकरा रही है जिन्दगीं,

ये कभी ख्वाहिश न थी के भीड़ मेरे साथ हो,
क्यूँ भला माज़ी को फिर दोहरा रही है ज़िन्दगी,

दो क़दम आगे चले और एड़ियां कटने लगीं,
इसके मानी,ज़िन्दगी को खा रही है ज़िन्दगी,

भीड़ से तो बच गए अब क़ब्र ऑ तन्हाई है,
ज़िंदगी को बे-वफ़ा ठहरा रही है ज़िन्दगी...
उर्मिला माधव...

                           2
अब यही हालात हैं,तहज़ीब रक्खी ताक़ पर,
रंग में कालक मिलाई और घुमाया चाक़ पर

दिल में लाखों मैल लेकर,दिल मिलाने आगये,
बे-हयाई का चलन है समझें हैं बेबाक़ पर....

अब वो रंगा-रंग जैसा होलियों का रंग कहाँ,
रंग थे होली के गाढ़े,दिल बहुत शफ्फाक़,पर ....

वो सुरीले फाग के रंग वो मुग़न्नी अब कहाँ,
कौन है बाक़ी मुनक़्क़ीद,ख्वाहिशे,मुश्ताक़ पर,

लोग जो जीते थे,ज़ात-ए-किब्रिया के वास्ते,
जान दे जाते हैं आख़िर अब हुजूम-ए- शाक़ पर....

अब जुबां का बंद रखना,वक़्त को दरकार है,
तज़किरा करना ही क्या अब,हालत-ए-नापाक़ पर,

इस तरह दामन बचाना,शोहदों के हाथ से
रंग तुम लगने न देना,"महजबीं" पोशाक पर
उर्मिला माधव...

                            3
Urmila Madhav updated her status.
Mar 13, 2016 6:39pm

हम निरे अहसास से जूझा किये दिन रात बस,
आपने जारी रखे,....अपने मुक़म्मल घात बस,

अब्र भी कुछ आदतन बस बर्क बरसाया किया,
जिस्म-ओ-जां तनहा रहे कुछ था भी तो हालात बस,

हम कभी समझे नहीं क्यूँ कर हसद था आपको,
तज़किरा करते रहे क्यूँ बात और बेबात बस

आप भी जब दोस्ती के नाम पर धब्बा रहे ,
झूठ सच के बलबले थे गम की थी इफरात बस

कम जगह पड़ने लगी तो होगया हलकान दिल,
दम-ब-दम बढ़ती रही सैलाब की तादात बस,

इन बलाओं से .....कभी बचना हमें आया नहीं,
झोंकते ही रह गए हम अपने सब जज़्बात बस,
उर्मिला माधव...

                             4
दिल को भाया तू जो मेरे तुझमें देखा डूब कर,
इतनी कालक थी वहां पर,लौट आये,ऊब कर,

तेरी दुनियां तेरे हाथों सौंप कर हम चल दिए,
और तुझसे कह दिया जो जी में आये ख़ूब कर....

पीठ करदी तेरी जानिब,ज़ख्म आगे कर लिए,
दिल को समझाया अना का रास्ता मंसूब कर,

पहले भी तू बेवफ़ा था,आज भी वो शक़्ल है,
ये तेरे दिल का शगल है,नित नया महबूब कर,

ज़िंदगानी उम्र भर ज़द्दोजेहद का नाम है,
साहिबे ईमान हो जा,प्यार को उस्लूब कर...
उर्मिला माधव....

                           5
दिल्ली की औरत------
एक नज़्म हालत-ए-हाज़िरा पर...

लो मेरी दास्तां सुन लो मैं हूँ ख़ातून दिल्ली की,
हिली जाती है अब बुनियाद,अफ़लातून दिल्ली की,

नहीं महफूज़ अस्मत है,के दिल में ख़ास दहशत है,
क़दम बाहर निकालूँ जो तो बस अंजाम वहशत है,

समझ में कुछ नहीं आता के किस दर्ज़ा जिया जाए,
सम्हाले ग़म कोई कितने,ज़ह्र कितना पिया जाये,

ये दिल्ली आज तक लाशों के अंबारों पे रख्खी है,
अभी तक आबरू औरत की मीनारों पे रख्खी है,

न जाने क्या दिया अजदाद ने,दिल्ली को विरसे में,
मेरा दिल चाहता है काश इसको समझूँ फिर से मैं,

जहाँ औरत की अव्वल ज़ात को सस्ता समझते हैं,
करे दिलजोई मर्दों की,यही रस्ता समझते हैं,

मगर मुझमें भी है सीता,कोई रज़िया कोई राधा,
बिना मेरी मुहब्बत के वजूद-ए-मर्द है आधा,

मैं शीरीं हूँ,मैं लैला हूँ,में दुर्गा हूँ,मैं अम्बा हूँ,
अगर सच जानना चाहो तो मैं चिड़ियों का चम्बा हूँ,

मगर जब याद आता है के मैं ग़ैरत हूँ दिल्ली की,
बहुत ख़तरे में रहती हूँ,के मैं औरत हूँ दिल्ली की,

के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।।
के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।।
उर्मिला माधव...

                                      6
ग़ज़ल
हम जो बारिश में कभी भीग के घर जाते हैं,
यक़ता आँखों की चमक देख के डर जाते हैं,

आईना देखें नहीं,इतनी क़सम दी खुद को,
लाख़ बचते हैं मगर फिर भी उधर जाते हैं,

हमने लोगों से कभी कोई भी शिकवा न किया,
अपनी आहट से मगर, लोग बिखर जाते हैं,

हमको अंदाज़ मगर इसका कभी हो न सका,
किसकी चाहत के कहीं ख़्वाब से मर जाते हैं,

ग़म की रफ़्तार तो ठहरेगी नहीं, ज़ाहिर है,
चलते-चलते ही कहीं, हम ही ठहर जाते हैं....
उर्मिला माधव....

                           7
अपने दिल को तोडना अच्छा नहीं है बारबार,
दर्द की जद में हो चाहे...फैसला हो एक बार,
::
हर अना को तोड़ कर इमकान मत कीजे जनाब,
हर कोई है मस्त ख़ुद में,कौन किसका ग़मगुसार,
::
ज़हमतें क्यों मोल लेना,चाहे-अनचाहे हुज़ूर,
मुब्तिला गैरों में रहना,किसलिए दीवानावार?
::
दह्र से उम्मीद रखना .......हैं महज़ नादानियां,
और अब क्या चाहिए,जब ओढ़नी है तार-तार,
::
क्या किसीके दर पै जाना अपने ग़म के वास्ते,
खुद ही मुंसिफ़,ख़ुद अदालत,हो रहो ख़ुद पैरोकार...
उर्मिला माधव...

                          8
गुफ्तगू के दरमियां कल इक अजब किस्सा हुआ,
नींव का पथ्थर लगा हमको बहुत खिसका हुआ,

कशमकश में घूमते हम रह गए दीवानावार,
रात भर हमने समेटा जब यकीं बिखरा हुआ,

ज़िन्दगी भर के तजरिबे हर नफ़स हावी हुए,
याद हम करते रहे तक़दीर का लिख्खा हुआ,

लफ़्ज़ कुछ उसने कहे अपनी जुबां से यक़-ब-यक़,
होश में था ही कहां उसका ज़ेहन बहका हुआ,

अब यही बस देखना है,किस तरफ को रुख करें,
कह गया हमसे बहुत कुछ कारवां छूटा हुआ,

लौट कर हम आ गए अपने दर-ओ-दीवार में,
इश्क़ के बाज़ार में जब दिल बहुत सस्ता हुआ।।।
उर्मिला माधव

                             9
चिलमन दरूं गिरा के किया आपने गुनाह,
इस बे-अदब अदा का भला क्या करेंगे आह !!,

इन फासलों के साथ ही चलना है गर हमें,
किसकी करेंगे आरज़ू,किसकी तकेंगे राह,

करने से पहले आपने सोचा तो होगा खूब,
हरक़त को आफरीं है,अदावत की वाह-वाह !!

इसके हुए ये मानी के उल्फत हुयी तमाम,
अब देखनी है आपकी बदली हुयी निगाह,

हमको किया अमीर भी इफरात से हुज़ूर ,
रख्खेंगे अब सहेज के ये आह और कराह,
उर्मिला माधव..

                          10

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं,
जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं,

अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये,
कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं,

मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब,
ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं,

फरेब-ओ-मख्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका,
दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं,

किसीका क़त्ल करने को...हुनर की क्या ज़रुरत थी,
कि बस हाथों की तलवारें....ज़हर में घोल ली जातीं...
उर्मिला माधव...

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