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Showing posts from March, 2026

ज़ब्त करना

ज़ब्त करना अगर मुहाल हुआ, हां मगर तोड़ कर मलाल हुआ, ख़ुद ही सकते में आ गए हम भी, इतनी ऊंचाई पर ज़वाल हुआ, उर्मिला माधव  मर तो सकते थे पर अजब है ये, ख़ून ही दिल का पर हलाल हुआ रंग दुनिया का सर जमाल हुआ.. उर्मिला माधव 

गुनाह कर बैठे

हाए ये क्या गुनाह कर बैठे? ख़ुद ही ख़ुद को तबाह कर बैठे, ज़ब्त से काम ले रहे थे हम, जाने क्यूँ एक आह कर बैठे, भूल कर भूल हो गई हमसे, तेरी चाहत की चाह कर बैठे, किस क़दर हमसे ये गुनाह हुआ, ग़लतियाँ बेहिसाब कर बैठे, कितनी चाहत थी हँसके जीने की, फिरभी मरने की राह कर बैठे, ज़िन्दग़ी दूर-दूर होती गई, मौत से जो सलाह कर बैठे।....उर्मिला माधव.. 5.3.2013

फिर भी

एक पल की नहीं ख़बर फिर भी हमको लगता नहीं है डर,फिर भी, दम ब दम इम्तिहान देते हुए, पूरा करना ही है सफ़र, फिर भी, दह्र इंसां की इक कसौटी है, उसपे टूटा हुआ हो घर फिर भी, यूं ही हँसके निबाह करना है, चाहे थक जाए ये नज़र फिर भी, हमसे लाखों गुनाह हो जाएं, बंद होता नहीं ये दर, फिर भी, उर्मिला माधव
उम्र भर तो सब्र का दामन संभाला, अब भला हम किसलिए शिकवा करेंगे, वो जो मेरी ज़ीस्त का हिस्सा नहीं है, उससे फिर हम राब्ता भी क्या करेंगे, रोज़ उसको हम तड़पता देखते हैं  देखते रहते हैं उसको हम तड़पते, कौनसा रास्ता भला हम वा करेंगे हम क़दम आगे बढ़ा कर 

ये दिल ढूंढता है

ये दिल ढूँढता है जगहा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी, कभी ज़िंदगी में ये दिन भी दिखाना, के हर सम्त इक अजनबी रंग लाना, ज़मीं अजनबी,आसमां अजनबी हो, कोई शख्स हो रु-ब-रु,अजनबी हो, लगे जिसकी हर इक अदा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी..... हथेली पे कुछ नाम हों अजनबी से, पढ़े ही न जाएँ,पढ़ें हम कहीं से, मिले जो बशर वो बशर,अजनबी हो, सुनो मुख़्तसर,कुल दह्र अजनबी हो, मिले दर्द-ए-दिल को दवा अजनबी सी, हवा अजनबी सी, फ़ज़ा अजनबी सी... उर्मिला माधव ... 4.3.2016...

ग़ैरों की मिल्कियत पे

एक मतला दो शेर --- गैरों की मिलकियत पे कोई बात क्या करे, वीरान रहगुज़र पे .......कोई रात क्या करे, सूरज निकल रहे हैं कई सम्त से हज़ार, पर तिश्नगी को लेके मुलाक़ात क्या करे, हमको सरापा आग ने जब ख़ाक कर दिया, ज़ख़्मों की ऐसी शक़्ल का बरसात क्या करे, उर्मिला माधव.. 4.3.2017

मानी कहां

इल्तिजा उसने मेरी मानी कहाँ, पर मिरे भी सब्र का सानी कहाँ, कांपती आवाज़ में रोका किये, उसने वो आवाज़ पहचानी कहाँ, सूखती है ये सरापा भीग कर,  इश्क़ की बुनियाद में पानी कहाँ, मैंने उसके हाल पर छोड़ा उसे, हो सकी तब कोई मनमानी कहाँ, उर्मिला माधव...

क्या करें

आपको हम चाह कर भी क्या करें, ज़िंदगी को और कुछ रुसवा करें? एक तो पहले ही परीशां हैं बहुत, आहें भर के तुमको बस देखा करें? चैन मिलना तो कभी मुमकिन नहीं, ज़िंदगी को दर ब दर ढूंढ करें?

बुरा लगता है

दम-ब दम ये सच है सर पै ग़ाज़ है, फिर भी दिल को बेख़ुदी पर नाज़ है, जा-ब-जा दर-दर भटक कर क्या करूँ, यूँ तो ख़ामोशी भी इक आवाज़ है, हैं निशाँ अश्कों के आरिज़ पर मिरे, इनमें कुछ गुस्ताख़ियों का राज़ है, तोड़ कर जो मुझको तोहफ़े में दिया, अब तलक हाथों में वो ही साज़ है, ग़म,तबस्सुम हैं मुकम्मल साथ में,   ज़िन्दगी का बस यही अंदाज़ है.....

जब उलझन हो दुनिया फीकी लगती है

जब उलझन हो दुनिया फीकी लगती है, हमको ये सब ख़ुद पर बीती लगती है, तुम कहते हो अच्छी है तो अच्छी होगी, लेकिन हम को उल्टी सीधी लगती है.. उर्मिला माधव

जद्दोजहद की ज़द में भी

जद्दोजहद की ज़द में भी तूफ़ान बन के उठ, ज़ेर ओ ज़बर की हद में भी उन्वान बन के उठ, अब वो समां है जिसमें कि आज़ाद हैं सभी, दुनिया की सारी रद में भी इंसान बन के उठ,

नज़्म

एक बार फिर--- ---------------- रात को रोज़ मुस्कुराती है, सहर होते ही रूठ जाती है, मेरे घर की मुँडेर पर आकर, शाम होते ही झिलमिलाती है, अपनी आदत के मुताबिक आकर, मेरी रातों को जगमगाती है, उसकी आमद से ऐसा लगता है, जैसे वो गीत गुनगुनाती है, अपने क़दमों की मीठी आहट से, मेरी यादों को छेड़ जाती है, दिल की ख़्वाहिश है मेरे साथ रहे, वो मगर फ़िर भी लौट जाती है, वो मेरा सब्र आज़माती है, मेरी हालत पै खिलखिलाती है, ऐसी ये चाँदनी है जो हरदम, ज़िन्दगानी से खेल जाती है, कोई जीता हो कोई मरता हो, वो यूँ ही रोज़ आती जाती है...... उर्मिला माधव.. 12.2.2013

दिल को भाया तू

दिल को भाया तू जो मेरे तुझमें देखा डूब कर, इतनी कालक थी वहां पर,लौट आये,ऊब कर, तेरी दुनियां तेरे हाथों सौंप कर हम चल दिए, और तुझसे कह दिया जो जी में आये ख़ूब कर.... पीठ करदी तेरी जानिब,ज़ख्म आगे कर लिए, दिल को समझाया अना का रास्ता मंसूब कर, पहले भी तू बेवफ़ा था,आज भी वो शक़्ल है, ये तेरे दिल का शगल है,नित नया महबूब कर, ज़िंदगानी उम्र भर जद्दोजेहद का नाम है, साहिबे ईमान हो जा,प्यार को उस्लूब कर...  उर्मिला माधव 2.3.2016

तुम तो कहते थे हम नहीं रोते

Tum to kahte the ham nahin rote, Fir ye aankhon me zalzala kya hai? Tumko gairon se kuchh nahin lena, Ab ye bolo ke masalaa kya hai ? Bas ke chalna hai chalte rahte hain,  Ilm ye kab hai, marhalaa kya hai? उर्मिला माधव 

ये कम नहीं है

जो ज़िन्दगी में सलामती है, ये कम नहीं है, के सांस अब तक भी चल रही है, ये कम नहीं है, हमारा ग़म से विसाल होगा हमारी किसमत, जहां की आंखों में बरहमी है ये कम नहीं है.. उर्मिला माधव

ज़िंदगी की तल्ख़ियों से इस क़दर बेज़ार हूं

ज़िन्दगी की तल्ख़ियों से इस क़दर बेज़ार हूँ, मारने-मरने की हद तक पुश्त-ओ-पा खूंखार हूँ, आये महफ़िल में चुकाने,आपसे बाक़ी हिसाब, आपको ख़ामा- ख़्याली है कि मैं ग़म-ख़्वार हूँ, वक़्त वो कुछ और था जब घर हमारा था कहीं, आओ इस्तक़बाल है कि अब महज़ इक दार हूँ, फैसला करने की नौबत है तो फिर क्या देर है,  हूँ मुक़ाबिल आपके शम्स-ओ-क़मर,तैयार हूँ, उर्मिला माधव...