कोई साथ न चलता हो
जब वक़्त बदलता हो,
कोई साथ न चलता हो,
बेजा ये ज़माना है,
बस इसको हटाना है
ख़्वाबों से परे हट कर,
अल्लाह से ज़िद मत कर,
ये ख़ाक ज़माना है,
इसमें तो न जाना है,
बस दर्द इबादत है,
हमको यही आदत है,
हम छोड़ चुके सब को,
बस याद करें रब को,
जो फांस चुभी दिल में,
अब तक न निकाली है,
चेहरों के तमाशे हैं,
दुनिया भी तो जाली है,
सड़कों पे हैं चौराहे,
तो जाए जहां चाहे,
उर्मिला माधव
ये एक नज़्म है
मेरे दिल से निकली हुई
Comments
Post a Comment