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Showing posts from April, 2024

दुश्वार हो गई

ये ज़िंदगी भी क्या कहें दुश्वार हो गई, हम देखते ही रह गए बस हार हो गई.. अपनी तरफ़ से दिल की बहुत कोशिशें रहीं, पर एक जैसी दिल्लगी हर बार हो गई.. जब जब भी हमने हाथ मिलाया हवा के साथ आंधी चली ऑ ज़िंदगी मिस्मार हो गई.. कोई समां नहीं था कभी यूं भी ख़ुशगवार इक रौशनी भी हसरते दीदार हो गई.. क्या जाने किसके वास्ते थीं,  वुसअतें  तमाम, इतने गमों से ज़िंदगी बेज़ार हो गई.. उर्मिला माधव

किसने भेजा है ये पयाम

किसने भेजा है ये पयाम कुछ पता तो करो, क्या है इलज़ाम मेरे नाम कुछ पता तो करो, शह्र में किस तरह का शोर आज बरपा है' सबका है सब्र क्यूं तमाम कुछ पता तो करो... चार सम्तों में इक नफ़स को जगह है के नहीं, और क्या क्या है इंतज़ाम कुछ पता तो करो. ख़ून के रंग में अब रंगी सी लगे रंग ए हिना, किस तरह का है इंतक़ाम कुछ पता तो करो. क्यों हवाओं में रंग शामिल है अब सियासत का, और किस किस का है ये काम कुछ पता तो करो #उर्मिलामाधव 29.4.2015..

बीनाई तो पाई नहीं

आँख है पर क्या करें बीनाई तो पायी नहीं, बात बढ़के हसरत-ए-दीदार तक आई नहीं, आँख से परदे हटाके,दिल की जानिब देखले, इस तरह गर्दन झुकानी क्यूँ तुझे आई नहीं?? तार दामन के बचाता है अबस ही बे खबर, इश्क़ में दीवाना होना....कोई रुसवाई नहीं, जो तू मिलना चाहता है,दिलनशीं महबूब से, सर झुका कुर्बान होजा.....वरना शैदाई नहीं, है अनल-हक़ देख तो नज़रें घुमा कर चार सू ये जो अनहद बज रहा है क्या वो शहनाई नहीं? उर्मिला माधव... 29.4.2016

काग़ज़ की इक ज़मीं पर

एक आवाज़.... मैले कुचैले कपडे आँखों की इस नमी पर, ख़ाके उतारते हैं काग़ज़ की एक ज़मीं पर, तकलीफ को हमारी,मौज़ू बना बना कर, उंगली चुभा रहे हैं,हालात की कमी पर, कैसे बताएं इनको,इनकी तरह हैं हम भी, मुफलिस तो हैं सही है,होते हैं हमको ग़म भी, क़ुर्बान करना छोडो अपनी बुलंदियों पर, ये ज़्यादती बड़ी है,किस्सा करो ये कम भी, मिल जायेंगे तख़ल्लुस तमगे भी दिलबरी के, इज्ज़त के ऊंचे मसनद,चर्चे सुख़न बरी के, नौटंकियाँ तुम्हारी तुम नाच लो कहीं पर, पर इससे क्या गरज है,लिखते हो सब हमीं पर, सुल्तान इस अहद के,हालात कुछ न बदले है आफरीं सियासत,इतिहास कुछ न बदले, #उर्मिलामाधव... 25.4.2015

ज़िंदगी हमारी है

झूठे लफ़्ज़ों से ग़म गुसारी है, अय अमां ये भी कोई यारी है , ख़ास खुन्नस को रंग देते हो, ऐसा ये ख़ब्त कबसे तारी है? सिर्फ़ दिल से क़यास करते हो, ये कमी दम-ब-दम तुम्हारी है, इसका अहसास ही तो मुश्किल है, कौन पलड़ा कहाँ पै भारी है, हमको जीने दो जैसे जीते हैं, अय मियाँ ज़िन्दगी हमारी है, #उर्मिलामाधव ...

मोतबर नहीं होता

कोई भी मोतबर नहीं होता, हो भी तो उम्र भर नहीं होता, तेरी फ़ितरत अगर सही होती, राबिता दर ब दर नहीं होता, इक मरासिम था सो भी टूट गया, जो कभी मुख़्तसर नहीं होता, बस मिरा फ़ैसला भी सुन लीजै, अब यहां कुछ असर नहीं होता, उर्मिला माधव बाब-दरवाज़ा इंतिख़ाब--सिलेक्शन

हबाब है

तिरछी अदा से बात का कहना सवाब है, कुछ भी सह्ल नहीं है, ज़माना ख़राब है, बच बच के चल रहे हो, कहाँ बच सके मगर, बेआबरू खड़े हो, यही इक जवाब है, जिस राह पर चले हैं तहम्मुल से आज तक, एहसास हो गया है यहीं इज़्तिराब है, जब तुन्द आंधियों से कभी हम नहीं डरे, सरमाया ज़िन्दगी का मगर, आब आब है, उनको गुमान  तिफ़्ल हमें जानते हैं वो, दिल में हसद है मुंह पे मगर जी जनाब है, हम मुस्तहक थे फिर भी कभी कुछ नहीं कहा, अपना वजूद उनको फ़क़त  इक हबाब है, उर्मिला माधव

लिखी है

इन आँखों में इक ज़िंदगानी लिखी है, हक़ीक़त नहीं है, कहानी लिखी है, सहर को कहीं शाम लिख डाला हमने ख्यालों की कुछ खींचा तानी लिखी है नज़र हम झुका कर खड़े हैं जहाँ पर  मुहब्बत की तश्ना दहानी लिखी है उर्मिला माधव

दिल तोड़ा होगा

जब तूने दिल तोड़ा होगा, कैसे तुझको छोड़ा होगा। तनहाई में अक्सर जाकर, चौखट पै सर फोड़ा होगा। बाँयां हाथ जिगर पै रखकर,  दिल का दर्द निचोड़ा होगा। चाहे जितना ग़म हो तुझको, मुझ से तो पर थोड़ा होगा। तुझे भुलाने की खातिर ही, खुद को खुद से जोड़ा होगा। दिल पर दाग़ लगाने वाले, तुझसा कौन निगोड़ा होगा..... उर्मिला माधव...

पर्दादारी है

ये तो बस अपनी पर्दा दारी है, तुमने क्या बात कब सँवारी है? हाल मेरा गैर से पूछा किए, वाह क्या ख़ूब ग़मग़ुसारी है ! तल्ख़ लहजे से बात करना ही, क्या मुहब्बत की आबशारी है? ऐसे शिकवे के कुछ नहीं मानी, जिसमें यकतरफ़ा बात जारी है, तुमको ख़ामोशिय़ाँ मुबारक़ हों, मुझको बस मेरी बेक़रारी है।...Urmila Madhav 22.4.2013

मरासिम तोड़कर

अब ज़मीं से आसमानों तक के रस्ते छोड़कर, हम चले आये हैं तुमसे सब मरासिम तोड़कर, चाह से और आह तक भी कर दिए हमने दफ़न,  चल नहीं सकते हैं हरगिज़ हम जहाँ की होड़ कर, तुमने बस इतना कहा था,छुपके ही मिलना कभी, तुमको देखा ही नहीं फिर आँख अपनी मोड़ कर  हम कलेजा साफ़ रख कर ही अबस तुमसे मिले, तुम हमेशा खुश रहे हो इसकी,उससे जोड़ कर ..... वक़्त ही तो है कभी ....उल्टा अगर ये हो गया, बैठ कर रोया करोगे,सर ख़ुद अपना फोड़ कर... #उर्मिलामाधव ... 22.4.2015

ख़ुद्दारी के दम पर

अपनी ख़ुद्दारी के दम पर जी रहे हैं। इस लिए हम ज़ह्र लाखों पी रहे हैं। बारहा होते मुख़ातिब ज़ख्म अक्सर हम मुसलसल साथ इसके ही रहे हैं। ये अनादारी है आदत के मुताबिक हम न ज़ाती रंग में तरही रहे हैं। आपसी रिश्ते निभाने के चलन में यों समझ लो एकदम सतही रहे हैं। जब जहाँ धोखा धड़ी का दौर आया इक निशाने इसके बस हम ही रहे हैं। Urmila Madhav... 22.4.2016

शोर क्यूँ मचाते हो?

तुम तो बस इश्क़ गुनगुनाते हो, इस क़दर शोर क्यूं मचाते हो? दिल को हलकान क्यूं करो आख़िर, किस लिए इतना बड़बड़ाते हो? तुम भी वाकिफ़ हो इसमें सच क्या है, फिर ये दुनिया को क्यूं जताते हो? उर्मिला माधव

कैसे जीते हैं

कैसे जीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल, आग पीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल, तेरी खिड़की जो हर इक शाम कहीं बंद हुई, हाथ रीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल, कितने गहरे हैं मेरे ज़ख़्म बड़ी मुद्दत से, ख़ाक जीते हैं, इधर देख ज़रा घर से निकल, उर्मिला माधव। ... 23 .1 .2017

ज़ब्त की बातें

जिस्मो जाँ रूह तुझे प्यार करे है लेकिन ये बड़े ख़ब्त की बातें हैं इन्हें क्या कहना हर घड़ी शाम-ओ-सहर याद करे है लेकिन ये बड़े ज़ब्त की बातें हैं इन्हें क्या कहना अपने जज़्बात बड़े शोर से ज़ाहिर करदूँ ये तो कुछ वक्त की बातें हैं इन्हें क्या कहना ये मेरी शायरी ये मेरे लिखे शेर-ओ-सुखन ये तो बस रफ़्त की बातें हैं इन्हें क्या कहना  उर्मिला माधव..........

छोटे बड़े बहुत

कुछ हादसे हुए हैं जो छोटे बड़े बहुत, हम ज़िंदगी के हाथ से छूटे, लड़े बहुत आंगन के एक पेड़ में पत्ते भी थे कभी, तूफां का ऐसा ज़ोर था, टूटे झड़े बहुत, दीवानापन सवार था चलना ही है हमें सो जो भी थे सहारे वो उल्टे पड़े बहुत उर्मिलामाधव कुछ ज़िंदगी के हादसे उल्टे पड़े बहुत

किसका वक़ार क्या है

किसका वक़ार क्या है,ये जानते नहीं हम, आखिर जवाब क्या है,क्यूँ ठानते नहीं हम?? किसकी है कारसाज़ी,खारिज़ हैं सब इरादे, वहम-ओ-सराब क्या है,पहचानते नहीं हम,  कितनी है जिंदगानी,इसको भरम रखा है, इसका हिसाब क्या है,कुछ जानते नहीं हम, गहराई नापते  हैं,कमसिन जवानियों की, हुस्न-ओ-शबाब क्या है!!क्यूँ मानते नहीं हम, लम्बी ज़बान करके,थूका किये सभी को, इसमें खराब क्या है,ये छानते नहीं हम.... उर्मिला माधव ... 9.4.2014...

कहाँ तक जाते हम

किस-किस को समझाते हम. और कहाँ तक जाते हम, जितनी अपनी हिम्मत थी, उतना ही कर पाते हम, सभी ज़ेह्न में ज़ह्ऱ लिए, किस पर प्यार लुटाते हम, इतनी अपनी ताब कहाँ, झूठी कसमें खाते हम, अंदर तो ख़ामोशी है, बेजा शक़्ल सजाते हम, अलग-थलग ही बेहतर है, क्यूँ कर बात बढ़ाते हम.. तनहाई तो आदत है, किसके दर पर जाते हम? उर्मिला माधव। 9.4.2017

क्या-क्या

दाग़-ए-दिल,ज़ख्म-ए-जिगर तुमको दिखाऊँ क्या क्या, रु-ब-रु जो हूं मैं वो तुमको बताऊँ क्या क्या  तुमने इलज़ाम अभी मुझ पे लगा डाले बहुत, अपनी जानिब से तुम्हें दर्द सुनाऊँ क्या क्या, कभी काला तो कभी रंग रंगा  है गंदुम सारे रंगों से अलग हटके बनाऊं क्या क्या, इक शिकायत का ज़खीरा है मेरे दामन में  बरसरे बज़्म तमाशा है जताऊँ क्या क्या...  उर्मिला माधव....

ज़िंदगी जब कभी थका दे तो....नज़्म

ज़िन्दगी जब कभी थका दे तो, चल न पाओगे ये बता दे तो, आह भरने का कोई काम नहीं, ख़ुद ब ख़ुद ही उठें ऑ चलते रहें, क़ुदरतन कोई जब जगा दे तो, राह का एहतराम करते रहें, ये न सोचें कि कोई साथ नहीं, साथ देने को कोई हाथ नहीं धीरे धीरे ही सही, चलते रहें, गाहे गाहे ब ख़ुद संभलते रहें, भूल जाएं, किसीने कुछ भी कहा.. सिर्फ़ सोचें कि कोई बात नहीं, सांस जब तक है, कोई रात नहीं, धुन्ध कैसी भी हो, सवेरा है, दह्र में जब तलक बसेरा है... उर्मिला माधव

इज़्तिराब वाले

रुतबा दिखा रहे हैं,इल्म-ओ-ख़िताब वाले, हैरत में पड़ गए हैं,इज़्ज़त-ओ-आब वाले, कितनी मुख़ालफ़त है, आए हुजूम लेकर, आंखें मिला रहे हैं, ईमान-ओ- ख़ाब वाले, जज़्बात मांगती है, हर्फ़-ओ-अदब की दुनियां, गिनती सिखा रहे हैं,कागज़ किताब वाले, दावा ही कब किया है,फ़नकार हम हैं यारब, फिर भी सवाल लेकर,आए हिसाब वाले, सबको है ये तआज्जुब,ज़िंदा हैं हम अभी तक, तूफां से लड़ सके हैं, बस इज़तराब वाले बाद-ए-सबा में हर सू कीलें उछल रही हैं, सूली से कब डरे हैं , ईसा की ताब वाले, उर्मिला माधव,