दुश्वार हो गई
ये ज़िंदगी भी क्या कहें दुश्वार हो गई,
हम देखते ही रह गए बस हार हो गई..
अपनी तरफ़ से दिल की बहुत कोशिशें रहीं,
पर एक जैसी दिल्लगी हर बार हो गई..
जब जब भी हमने हाथ मिलाया हवा के साथ
आंधी चली ऑ ज़िंदगी मिस्मार हो गई..
कोई समां नहीं था कभी यूं भी ख़ुशगवार
इक रौशनी भी हसरते दीदार हो गई..
क्या जाने किसके वास्ते थीं, वुसअतें तमाम,
इतने गमों से ज़िंदगी बेज़ार हो गई..
उर्मिला माधव
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