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Showing posts from January, 2023

कर गए हो तुम

मेरे जी से उतर गए हो तुम, दिल मिरा ग़म से भर गए हो तुम, वो जो जुरअत न  कर सका कोई वो ही जुरअत तो कर गए हो तुम, ख़ामियों से तुम्हारी वाकिफ़ हूँ, मैंने समझा के डर गए हो तुम, मेरी ख़ामोशियां ही बेहतर हैं, सच तो ये है के मर गए हो तुम, उर्मिला माधव

रहता है

दिल में कैसा फ़ितूर रहता है इसमें कोई ज़ुरूर रहता है, तेरी उल्फ़त बहुत क़रीब है जो, मुझको इसपे गुरूर रहता है,

sabke bas me hai

इशारों में ज़माने को चलाना सबके बस में है, ज़रा मालूम हो ताक़त कहाँ कमज़ोर नस में है,  जला कर एक बीड़ी,रात भर बैठा रहा छत पै, उसे गफलत रही शायद कि वो दो चार दस में है, बनाने के लिए एक आशियाना चाहिए,सब कुछ, मगर पंछी के घर की खुशबुएँ जंगल के ख़स में है, उर्मिला माधव... 6.5.2014...

मंसूब हो जाएं

इबादत से अगरचे हम......बहुत मंसूब होजाएं, तो लाज़िम है ज़माने की नज़र में ख़ूब हो जाएं, किसी दिल में क़दम रखना भी कार-ए-पुख्ता कारा है, ज़रा नज़र-ए-इनायत हो......कि बस महबूब हो जाएं, हज़ारों जान से कुरबान होने पर भी क्या हासिल, मज़ा तो तब है जब हम....दर्द के उस्लूब होजाएं, हम अब भी आज भी अपने जिगर में ताब रखते हैं, अगर जो ज़िद पे आजाएं...तो बस मतलूब हो जाएं... उर्मिला माधव 11.12.2013.. उस्लूब--- आचरण  मतलूब---प्रेमी

जा ब जा झुकता न था

फिल्बदीह में कही गई ग़ज़ल---- सर हमारा जा-ब-जा झुकता न था, हम को कोई आस्तां जंचता न था   किसको आख़िर मोतबर हम मानते, जब के कोई बात पर टिकता न था, हम मसर्रत की दुआ करते रहे, दूर तक उससे कोई रिश्ता न था , क्यूँ किसी को हम मसीहा मानते, जब कोई किरदार ही पुख्ता न था, हादसे अपनी जगह क़ायम रहे, हौसला अपना मगर रुकता न था, कौन देता मोल चाहत का मिरी, ये वो सिक्का था कहीं चलता न था, यूँ तो दामन था भरा,पर रंज से  ये ज़खीरा तो कहीं बिकता न था हमने सोचा मुन्तजिर भी क्या रहें, रास्ता जब कोई भी दिखता न था.... #उर्मिलामाधव... 12.1.2016

ज़लज़ले के बाद

आंखें ठहर गईं हैं सहर देखने के बाद, जुम्बिश कहाँ करेंगी किसी ज़लज़ले के बाद, काविश हमारी देख ले हम उम्र भर चले, फिर उठ खड़े हए हैं नए मसअले के बाद हमको पुकारना है ग़लत, हम तो रुक गए, दम तोड़ के खड़े हैं किसी वसवसे के बाद, जो हो चुका है उसके तईं, ग़म भी क्या करें, ये फ़ैसला किया है हर इक हादिसे के बाद, उर्मिला माधव

चलते चलते हम कभी मर जाएं तो ?

चलते-चलते हम कभी मर जाएं तो? इक ख़बर की शक़्ल में घर जाएं तो? ज़िन्दगी का क्या है, थक जानी ही है, इस पे घर वाले भी सब डर जाएं तो? इस की भरपाई भी कर सकते हैं हम, सबके दिल गर प्यार से भर जाएं तो। कुछ भी तब होता रहे जब हम न हों, माना इसकी फ़िक्र भी कर जाएं तो? कुछ समय तो याद सब रहते ही हैं, चोर या फिर मोतबर मर जाएं तो। . उर्मिला माधव

दुनियां में किसी शै से मुहब्बत नहीं रही

दुनिया में किसी शै से मुहब्बत नहीं रही, हमको किसीके प्यार की आदत नहीं रही, आगे क़दम तो पीछे अदावत के जाल हैं, दिल से मिलें किसीसे भीे,चाहत नहीं रही, दिल के बहुत क़रीब थे जब वो बदल गए, मजबूरियां थी,दिल को अक़ीदत नहीं रही, फ़ेहरिस्त दोस्तों की.....,नहीं याद अब हमें, हाँ अब किसी भी नाम से उल्फ़त नहीं रही, वो वक़्त कोई और था जब प्यार में थे हम  वो जोश वो जुनूं ......वो इबादत नहीं रही  बातें मज़ाहिया सी,ज़रा हंस के चुटकियाँ, लब-ए लवाब है .......के वो रंगत नहीं रही... उर्मिला माधव..

उंसियत होती नहीं है

उंसियत होती नहीं है अब किसी हालात से, इतनी नफ़रत हो गई है आदमी की ज़ात से, हर नए इनसान से अब कोफ़्त होती है हमें, दब गए हैं इस क़दर हम दर्द की इफ़रात से, इक नए अंदाज़ से आकर गले मिलते भी हैं, पर सभी किरदार हैं इक तीरगी की रात से, उर्मिला माधव..

किस मकान में

बरपा किया है शोर सा, इतना जहान में, समझे नहीं कि हम हैं यहां किस मकान में, दरया की ख़ुश्कियों ने दिखा दी है बानगी, जब क़श्तियाँ भी उड़ने लगीं आसमान में, हर कोई गिर रहा है,ज़मीं खींचती सी है,  इस पर कमी कहां है किसी इत्मिनान में, हमको गुमां नहीं है किसी आसमान का, हम मोतबर कहाँ हैं किसी इम्तिहान में, उर्मिला माधव  13.1.2019
आंख पर पत्थर रखो और छोड़ दो, अपने ग़म को फिर नया इक मोड़ दो, सर को चौखट पर रखो और फोड़ दो, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से जोड़ दो

बहुत देखा जहां जाना नज़्म

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, और हाँ वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , के ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, कभी मेरी गली आना..... #उर्मिलामाधव... 9.1.2016

तू भी नहीं

Main agar mazboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabishtaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin BewafaiI ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach yahi hai ke bahut , bezaar to tu bhi nahin.... Urmila Madhav..

नज़्म

जब मिरा वक़्त गिर रहा था कहीं, मैंने दामन हज़ार थामे थे, कितने ही ग़म गुसार मांगे थे, किसको फ़ुर्सत थी कोई सुन लेता,