ज़लज़ले के बाद
आंखें ठहर गईं हैं सहर देखने के बाद,
जुम्बिश कहाँ करेंगी किसी ज़लज़ले के बाद,
काविश हमारी देख ले हम उम्र भर चले,
फिर उठ खड़े हए हैं नए मसअले के बाद
हमको पुकारना है ग़लत, हम तो रुक गए,
दम तोड़ के खड़े हैं किसी वसवसे के बाद,
जो हो चुका है उसके तईं, ग़म भी क्या करें,
ये फ़ैसला किया है हर इक हादिसे के बाद,
उर्मिला माधव
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