जा ब जा झुकता न था
फिल्बदीह में कही गई ग़ज़ल----
सर हमारा जा-ब-जा झुकता न था,
हम को कोई आस्तां जंचता न था
किसको आख़िर मोतबर हम मानते,
जब के कोई बात पर टिकता न था,
हम मसर्रत की दुआ करते रहे,
दूर तक उससे कोई रिश्ता न था ,
क्यूँ किसी को हम मसीहा मानते,
जब कोई किरदार ही पुख्ता न था,
हादसे अपनी जगह क़ायम रहे,
हौसला अपना मगर रुकता न था,
कौन देता मोल चाहत का मिरी,
ये वो सिक्का था कहीं चलता न था,
यूँ तो दामन था भरा,पर रंज से
ये ज़खीरा तो कहीं बिकता न था
हमने सोचा मुन्तजिर भी क्या रहें,
रास्ता जब कोई भी दिखता न था....
#उर्मिलामाधव...
12.1.2016
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