sabke bas me hai
इशारों में ज़माने को चलाना सबके बस में है,
ज़रा मालूम हो ताक़त कहाँ कमज़ोर नस में है,
जला कर एक बीड़ी,रात भर बैठा रहा छत पै,
उसे गफलत रही शायद कि वो दो चार दस में है,
बनाने के लिए एक आशियाना चाहिए,सब कुछ,
मगर पंछी के घर की खुशबुएँ जंगल के ख़स में है,
उर्मिला माधव...
6.5.2014...
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