Posts

Showing posts from March, 2022

ग़ज़ल की प्रचलित बहरें

ग़ज़ल की प्रचलित बहरें  1. बहरे कामिल मुसम्मन सालिम मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन 11212 11212 11212 11212   ये चमन ही अपना वुजूद है इसे छोड़ने की भी सोच मत नहीं तो बताएँगे कल को क्या यहाँ गुल न थे कि महक न थी ——————————————– 2. बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन 2122 1212 22   प्या ‘स’ को प्या ‘र’ करना था केवल एक अक्षर बदल न पाये हम ——————————————– 3. बहरे मज़ारिअ मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़ मुख़न्नक मक़्सूर मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन 221 2122 221 2122   जब जामवन्त गरजा, हनुमत में जोश जागा हमको जगाने वाला, लोरी सुना रहा है  ——————————————– 4. बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ मुफ़ाइलुन फ़यलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन 1212 1122 1212 22   भुला दिया है जो तूने तो कुछ मलाल नहीं कई दिनों से मुझे भी तेरा ख़याल नहीं  ——————————————– 5. बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़ मफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईलु फ़ाइलुन 221 2121 1221 212   क़िस्मत को ये मिला तो मशक़्क़त को वो मिला इस को मिला ख़ज़ाना उसे चाभियाँ मिलीं  ——————————————– 6...

समेटना बिखरी हुई पत्तियों का

समेटना, बिखरी हुई पत्तियों का, सरल नहीं, तोडना, टूटी हुयी टहनियों का, बहुत सरल है, पर आवाज़ का क्या करोगे? जो तोड़ने से हुई, पर हाँ, किसीके टूटने-जुड़ने से, कोई आहत नहीं होता, ये निजता की बात है, कभी किसी वृक्ष की छाया, भली लगती है, क्यूंकि उसमें हरियाली जो है, कभी किसी वृक्ष का खड़े रहना, भी सालता है, दूषित मन को, क्यूंकि सूखा हुआ वृक्ष किस काम का? पत्तियां तो सूख गईं, और उनका हरा होना  मुमकिन नहीं, अब मुक्त आकाश, में जीवन है  क्यूंकि  क्षितिज के पार भी कोहरा हो सकता है, पर अंतर्दृष्टि चाहिए होती है, एक गहरी अंतर्दृष्टि, पंछियों को आज़ाद रहना भाता है, बंदी होकर कोई सृजन नहीं होता... सिर्फ रुदन होता है, और रोना कौन चाहता है....?? पर तुम्हें कौन समझाए.....?? उर्मिला माधव.. 25.3.2017

ख़्वाब तुम्हारे गढ़े ही कब थे

ख़्वाब तुम्हारे गढ़े ही कब थे, तुम इस दिल में,चढ़े ही कब थे ? ख़ुद खींची जो लकीर हम ने, उस से ज़्यादा बढ़े ही कब थे? तुम से प्यार का शिकवा कैसा', तुम ये लफ़्ज़, पढ़े ही कब थे ? उर्मिला माधव 26.10.2017

इस क़दर भारी पड़ा

इस क़दर भारी पड़ा, दुनियां का हर मंज़र मुझे, दश्त सा लगने लगा मेरा ही अपना घर मुझे, हादसों की हर नफ़स बरपा हुईं सर गर्मियां, क्या बताऊँ किस क़दर लगने लगा था डर मुझे, गर ख़ुशी को वक़्त कम था,ग़म भी तो मसरूफ़ थे, अब बचा इक चैन जो दरकार था ,पल भर मुझे, यक़-ब-यक़ हंगामा-ए-ग़म, ख़ुद में पिन्हा हो गया, कर दिया घबराहटों ने बद से भी बदतर मुझे, उर्मिला माधव।। 17 .8 .2017

दिल पै दस्तक

दिल पै दस्तक जो सुबह शाम दिए जाती हूँ, तेरी नज़रों का एहतराम किये जाती हूँ, तेरे सीने में मेरा दिल भी धड़कता है कहीं, अपनी तक़दीर तेरे नाम किये जाती हूँ, मुझको आता ही नहीं देख नज़ाक़त का चलन, प्यार करना है मेरा काम,किये जाती हूँ, उर्मिला मा5

अच्छा बताओ

अच्छा बताओ मैंने कभी तुमसे कुछ कहा ? जो भी कहा वो तुम ने कहा मैंने बस सहा, मैं उम्र भर रही हूँ इन्हीं रंज-ओ-ग़म के साथ, सैलाब दुश्मनों का ......मेरे संग ही संग रहा, खुशियाँ तुम्हें मिलीं तो रहे दुश्मनों के पास, दरिया-ए-अश्क़ जब भी बहा ..मेरे घर बहा, मैं तो वफ़ा की राह में बिलकुल ज़हीन हूँ, तुम ही ने किये नज्र मुझे ......दर्द बारहा ... जैसी भी जो भी हूँ मैं मगर मोतबर तो हूँ, हर एक की तरफ से फ़क़त ज़ुल्म भर ढहा.... उर्मिला माधव.... 30.7.2016

नौरंग दिल

आज कल वो होगए हैं संग दिल, आदतन यूँ भी हैं वो कुछ तंग दिल, पश्त में इसको सजा कर ले गए , कितना सुंदर ख़ुशनुमाँ नौरंग दिल, इससे बढ़ कर बेरुख़ी होती भी क्या बा-अदब लौटा दिया बैरंग दिल, लौट कर उस दर पै अब क्यूँ जायेंगे, खुद ही खुद से कर रहा है जंग दिल, होगया आलूदा दस्त-ए-दह्र से क्या दिखाएँ उनको ये बदरंग दिल.... #उर्मिलामाधव... 4.5.2015

लगावइ छी

गलती बताने की नईं हो रई है हम्मे तस्वीर नईं लगावइ छी, सिर्फ़ शब्दन के संग आवइ छी , जेना तेना भी पार लगबौ हम, कौनौ हमरा कहाँ बतावइ छी, मैथिली, अंगिका में लिख देलहौं, की जनु कौन रंग कहाबइ छी, उर्मिला माधव

आए होते

वो अगर मिलने यहाँ तक आये होते, तो मेरे दिल तुम बहुत ललचाये होते, हाथ रखते,वो फ़सीलों पै भी आख़िर उस हथेली के निशाँ भी आये होते, बैठ जाते घर के एक दीवान पर भी, दर्द अपने दिल के कुछ बतलाये होते,  जो तरन्नुम दिल में रहते हैं मुसलसल, उनके संग कोने में जाकर गाये होते, कितने रागों की ख़नक़ है मेरे दिल में, बैठ कर आख़िर सभी समझाए होते, मैं समंदर पार आख़िर जाऊँ क्यूँकर, दो क़दम वो भी तो चलकर आये होते... नाम रख लूँ आज से मीरा मैं अपना, फर्क क्या तब आये या नईं आये होते .... #उर्मिलामाधव..... 15.5.2015

कित्ते दिन बचे हैं

ब्रज की दुनियां देखियो अब और कित्ते दिन बचे हैं, मेरे संग संग और कै साकिन बचे हैं? झूठ कौ झगड़ौ जबर ते का मिटैगौ, इक सपेरा, नाग और नागिन बचे हैं.. चैन की का सांस अब आवैगी हमकूँ? जब अबई जे दुख्ख तौ अनगिन बचे हैं.. को मुकद्दर कौ लिखौ अब मैट देगौ? जिंदगी में जेई दो पल छिन बचे हैं उर्मिला माधव

बेख़ुदी करने लगी है

काम मेरा बेख़ुदी करने लगी है, देख मैंने नींद फिर गिरवीं रखी है, ठीक रहता है कभी खामोश रहना, ये मेरी आदत है,मेरे संग चली है, Urmila Madhav.. 7.9.2016

अकेले चलते हैं

दुनियां के संग मेले चलते हैं, अपने राम अकेले चलते हैं, ख़ास फ़कीरी मुझमें रहती है, सबके साथ झमेले चलते हैं, गिनती करते ही थक जाओगे, मीज़ानों के रेले चलते हैं, उर्मिला माधव

सच कसम से

हमको लगता है कि तुम एक चाँद हो, चाँद ही तो दूर रहता है सनम से सच, कसम से, चांदनी आती है मेरे घर के दर तक, तुम कहीं आजाओ तो मर जाएँ धम से सच, कसम से, शर्म की पाजेब पांवों में है मेरे हो सके तो आके तुम मिल जाओ हमसे सच, कसम से, एक दिन दुनियां से हम उठ जायेंगे बस, बाद उसके रोओगे तुम दर्द-ओ-ग़म से सच कसम से, वो तुम्हारे आंसुओं से कम रहेगी, जो सहन में होगी बारिश,खूब,झम से सच कसम से, अब भी तुम आ जाओ अब भी वक़्त है, सांस रुक जायेगी इक दिन एकदम से सच,कसम से, उर्मिला माधव... 16.3.2016

आगरे का ताजमहल

आगरे का ताजमहल और मैं बेटी वहां की, और गली कूचे वहां के, कुछ हसीं मंज़र वहां के, दौड़ कर मथुरा कभी तो दौड़ के लखनऊ कभी हाथ में कुछ रेवड़ी, जो ख़ास लखनऊ में बनी हाथ में कंचे लिए बचपन की वो यादें सभी थीं कड़ी ताक़ीद अम्मा की मगर भाती थी मन को प्यार करना सीख लो भाई बहन को कुछ समझ आया नहीं था भोले मन को क्योंकि अम्मा कह रही थीं इसलिए करना था सब कुछ पर लड़कपन वो कुलांचे मारता था, लड़कियों के खेल मुश्किल से ही खेले हाथ में मंजा,पतंगें,भाई का सामान लेकर, दौड़ कर जीने पै चढ़ना बेसबब दीदी से लड़ना सिर्फ़ अपनी ज़िद पै अड़ना और गली के बालकों संग ख़ूब गिल्ली और डंडे दुश्मनी या दोस्ती से कोई मतलब ही कहाँ था जम गए बस खेल देखा, क्या सबब,क्या था कहाँ था दोस्त कुछ थे आगरा के और कुछ थे लखनऊ के जब जहाँ मौक़ा मिला के बस वहीँ खुशियाँ सजालीं पर मेरी एक ख़ास गुईंयां वो मेरी बहना निराली वो अजब सा एक रंग था, हर समय बहना का संग था एक ज़ालिम रस्म है दुनियां की जो शादी कहाती हो गई बहना से दूरी मैं हुई तनहा अधूरी वो बहन जिसकी बिदाई पर बहुत गिरते थे आंसू औरतें सब कह रही थीं कोई बन्नी गाओ धांसू थाप ढोलक की सुना कर हौसला सब दे रहे थे औ...

दर्द दिल में हज़ार होते हैं

दर्द दिल में हज़ार होते हैं, हम ही को बार-बार होते हैं, आँख जब-जब भी डबडबाती है, दिलजलों में शुमार होते हैं.. तेरा मिलना भी ग़म का वाइस है, हर नफ़स तार-तार होते हैं, ख़ुद संभलते हैं,कुछ भी होता हो, दोस्त कब ग़म गुसार होते हैं, जब कभी ग़म शदीद होता है, हम ही हम सोगवार होते हैं.. उर्मिला माधव, 15.3.2017

वक़्त ज़ाया करो

यार ये क्या कि यूँ वक़्त ज़ाया करो, तुम मुहब्बत भी थोड़ी कमाया करो, पूरी दुनिया में फिरते हो.....मारे हुए, चलते-फिरते इधर को भी आया करो  आओ बैठो ज़रा दिल की बातें करो, आधे रस्ते से मत लौट जाया करो, अपने लफ़्ज़ों में पैदा करो तो असर, कहते-कहते न तुम भूल जाया करो, कितनी पहचान रखते हो इंसान की  हर किसी को नहीं गम सुनाया करो  उर्मिला माधव... 9.3.2014..

अगर ये वक़्त कभी

एक मतला दो शेर----- अगर ये वक़्त कभी हम से डर गया होता, ये समझो ज़ोर-ओ-ज़बर ग़म भी मर गया होता, सदा-ए-रंज-ओ अलम, हमसे डर गई होती, बहार-ओ-गुल का चमन रक्स कर गया होता, अगर वफ़ा की नज़र,हमसे मिल गई होती,  पुराना ज़ख्म-ए-जिगर कबका भर गया होता, #उर्मिलामाधव ... 9.3.2015...

बिखर जाऊंगी

तार दिल के न छेड़ो,बिखर जाऊंगी, हादसों से थकी हूँ ....मैं मर जाऊंगी, गो कि जिसने है बख्शी मुहब्बत मुझे नाम उसके .ये अशआर कर जाऊंगी.. अय मुसव्विर मुझे फिर से तैयार कर, यूँ मैं आधी,अधूरी .....न घर जाऊंगी, तुझसे उम्मीद रखती हूं आक़ा बहुत, तू खरा तो उतर वरना डर जाऊंगी, ज़िन्दगी,मौत .....यकसां हैं मेरे लिए, या इधर जाऊंगी ...या उधर जाऊंगी.. उर्मिला माधव.. 93.2017

एक पल की नहीं ख़बर फिर भी

एक पल की नहीं ख़बर फिर भी हमको लगता नहीं है डर,फिर भी, दम ब दम इम्तिहान देते हुए, पूरा करना ही है सफ़र, फिर भी, दह्र इंसां की इक कसौटी है, उसपे टूटा हुआ हो घर फिर भी, यूं ही हँसके निबाह करना है, चाहे थक जाए ये नज़र फिर भी, हमसे लाखों गुनाह हो जाएं, बंद होता नहीं ये दर, फिर भी, उर्मिला माधव

देख आ हम तुझे बताते हैं

Dekh aA hum tujhe btaate hain, Kis tarah paaNv ladkhdaate hain, Jab zammiN zaar zaar roti hai, AasmaaN toot toot jaate hain, Ghum.se dil baith-baith jaataa hai, Aankh jub rahnumaaN churaate hain, Aah waalon kii kaun sunta hai, Raabite banke toot.jaate hain, Zindagi khalvaton se ladtii hai Jan o dil ghum me doob jaate hain, PaaaNv aise hii ladkhdaate hain Urmila Madhav

बेज़ार हूँ

एक मतला तीन शेर---- =============  ज़िन्दगी की तल्खियों से इस क़दर बेज़ार हूँ, मारने-मरने की हद तक पुश्त-ओ-पा खूंखार हूँ, आये महफ़िल में चुकाने,आपसे बाकी हिसाब, आपको ख़ामा-ख़याली है कि मैं ग़म-ख़्वार हूँ, वक़्त वो कुछ और था जब घर हमारा था कहीं, आओ इस्तकबाल है कि अब महज इक दार हूँ, फैसला करने की नौबत है तो फिर क्या देर है,  हूँ मुक़ाबिल आपके शम्स-ओ-क़मर,तैयार हूँ, उर्मिला माधव... 2.3.2014..