आगरे का ताजमहल
आगरे का ताजमहल और मैं बेटी वहां की,
और गली कूचे वहां के,
कुछ हसीं मंज़र वहां के,
दौड़ कर मथुरा कभी तो
दौड़ के लखनऊ कभी
हाथ में कुछ रेवड़ी,
जो ख़ास लखनऊ में बनी
हाथ में कंचे लिए
बचपन की वो यादें सभी
थीं कड़ी ताक़ीद अम्मा की
मगर भाती थी मन को
प्यार करना सीख लो भाई बहन को
कुछ समझ आया नहीं था भोले मन को
क्योंकि अम्मा कह रही थीं
इसलिए करना था सब कुछ
पर लड़कपन वो कुलांचे मारता था,
लड़कियों के खेल मुश्किल से ही खेले
हाथ में मंजा,पतंगें,भाई का सामान लेकर,
दौड़ कर जीने पै चढ़ना
बेसबब दीदी से लड़ना
सिर्फ़ अपनी ज़िद पै अड़ना
और गली के बालकों संग
ख़ूब गिल्ली और डंडे
दुश्मनी या दोस्ती से कोई मतलब ही कहाँ था
जम गए बस खेल देखा,
क्या सबब,क्या था कहाँ था
दोस्त कुछ थे आगरा के
और कुछ थे लखनऊ के
जब जहाँ मौक़ा मिला के
बस वहीँ खुशियाँ सजालीं
पर मेरी एक ख़ास गुईंयां
वो मेरी बहना निराली
वो अजब सा एक रंग था,
हर समय बहना का संग था
एक ज़ालिम रस्म है दुनियां की
जो शादी कहाती
हो गई बहना से दूरी
मैं हुई तनहा अधूरी
वो बहन जिसकी बिदाई पर
बहुत गिरते थे आंसू
औरतें सब कह रही थीं
कोई बन्नी गाओ धांसू
थाप ढोलक की सुना कर
हौसला सब दे रहे थे
और रस्मों की अजब सी
चुटकियाँ सब ले रहे थे
मैं तमाशा सी बनी
बहना को अपनी देखती
या कभी रोते हुए सर ढोलकी पर टेकती
फिर भी खुशियाँ थीं बहन की
इसलिए सब कुछ किया था
खो गई हूँ आज उन यादों के
घुटते ढेर में
पर समझना ही तो होगा
अब या थोड़ी देर में
अब तो मेरा आगरा है
और ना लखनऊ कोई
याद उन यादों को करके
बेसबब कितना हूँ रोई
उर्मिला माधव...
17 .6 .2015
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