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Showing posts from January, 2022

कोई क्या करे

पुराने पन्नों से--- ========== दिलजले महबूब की बांहों का कोई क्या करे?? खार से लिपटी हुयी राहों का कोई क्या करे?? एक हसरत के लिए..दुनिया नज़र अंदाज़ हो,  इस क़दर बहकी हुयी चाहों का कोई क्या करे?? ग़र्क़ हो ऐसी मुहब्बत,जो ख़ुशी को छीन ले  बर्फ होती,सर्द सी....आहों का कोई क्या करे, जो वफ़ा के नाम पर.....सूली चढा दे दार पर, उस अहद के बदगुमां,शाहों का कोई क्या करे?? कर दिए ज़ंजीर जिसने....ज़िन्दगी के रास्ते, फिर भला ऐसी सिपह्गाहों का कोई क्या करे??  उर्मिला माधव... 18.10.2013..

अदा दिखलाओगे

वक़्त को तुम क्या अदा दिखलाओगे? हम न कहते थे???बहुत पछताओगे... आख़िरश कब तक रहेगा रंग-ओ-बू, एक दिन तो .....सादगी पर आओगे.... #उर्मिला 30.1.2015...

छोड़ दे

फिल्बदीह के तह्त कही गई ग़ज़ल---- तीर अब दिल पर चलाना छोड़ दे  अपनी खातिर एक ख़ाना छोड़ दे, मैक़दों में आना जाना भूल कर, हंस ज़रा दिल का जलाना छोड़ दे, क्यूँ रहे खुशियों से यूँ महरूम तू, होश में आ लड़खड़ाना छोड़ दे, ग़म है अव्वल,ज़िन्दगी की राह में, इसलिए ख़ुद को सताना छोड़ दे, एक तू क्या हर कोई हलकान है, मान भी जा अब बहाना छोड़ दे, चश्म-ए-गिरियाँ ऑ कलेजा तर-ब-तर, चाक़ दामन ,सब गिनाना छोड़ दे, ग़म ग़लत कर जा कहीं तन्हाई में, जा-ब-जा,ग़म का सुनाना छोड़ दे, गर यूँ ही रोना है तो जी भर के रो, या कि फिर शम्मा जलाना छोड़ दे, इक ज़रा सी बात मेरी मान ले, मुफ्त के सदमे उठाना छोड़ दे... #उर्मिलामाधव... 27.1.2o16

बे वफ़ा है

2014 में लिखी एक ग़ज़ल--- ये तो ज़ाहिर है,वो बिलकुल बे-वफ़ा है, हाँ मगर दिल का अलहदा फ़लसफ़ा है, क्यूँ किसी इन्सान का शिकवा करूँ मैं, गम मेरी तक़दीर का अव्वल सफ्हा है, बारहा तन्हाइयां हैं,बारहा वीरां सफ़र भी, क्या समझते हो महज पहली दफा है?? रंजिशें जमकर निभायीं वक़्त ने भी,  ज़िन्दगी में हर कोई मुझसे खफा है, वक़्त की...महबूब की,तक़दीर की या, आप सब बतलाइये किसकी ज़फा है??  उर्मिला माधव... 27.1.2014..
सब लोग अपने अपने घरों को चले गए, पर देर तक खड़े थे उसी रहगुज़र पे हम

शजर देखा है

कितनी हैरत है गिरा,सब्ज़ शजर देखा है, वक़्त-ए-मुश्किल में बहुत देर ये घर देखा है, चश्म-ए-गिरियाँ का अँधेरा ही रहा आठ पहर, किस से ये कहते फ़क़त दर्द-ए-जिगर देखा है, यूँ तो नाज़ुक था,यही कहते सुने अहले नज़र, जम के पत्थर से लड़ा......ऐसा गुहर देखा है, घर बहुत जलते रहे,अब्र कहीं बरसा किया, ऐसा मंज़र भी कभी वक़्त-ए-सहर देखा है, दिल को होता ही नहीं इसका यकीं,कैसे कहें  फिर भी ये कहते रहे लोग.....मगर देखा है,  चढ़ते दरिया में भी रफ़्तार मुक़म्मल ही रही, हमने कश्ती को बिना खौफ़-ओ-ख़तर देखा है, उर्मिला माधव... 24.1.2014..

घर से निकल

कैसे जीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल, आग पीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल, तेरी खिड़की जो हर इक शाम कहीं बंद हुई, हाथ रीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल, कितने गहरे हैं मेरे ज़ख़्म बड़ी मुद्दत से, ख़ाक जीते हैं, इधर देख ज़रा घर से निकल, उर्मिला माधव। ... 23 .1 .2017

ये उठते हुए ग़ुबार

ये उठते हुए ग़ुबार दिल में, थका देते हैं, पाँव बंध जाते हैं, आहटें थका देती हैं  कानों को, ख़त्म होती हुई जिंदगियां, रुला देती हैं आंखों को, गर्द में मिला देती है ज़मीन आंसुओं को, बवंडरों के झोंके हिला जाते हैं रूह को, भूल गया दिमाग़, चौकन्ना होना, सो जाना चाहता है सब भूल कर, रब भूल कर, वही सच देखने को बेचैन दिल जो दिखाई नहीं देता, सुनाई देता है, धुन्ध के ग़ुबार इनमें चरमराते हुए सूखे पत्ते, खौलते हुए एहसास , दबी हुई आहें, सांप के फन की तरह उठ खड़ी होती हैं, हम इन से डरके बचाते हैं ख़ुद को, पर डसते हैं इतनी तेजी से, सांस जाने की ख़बर नहीं होती, हम फंसे रह जाते हैं उनमें उलझ जाते हैं, ज़िन्दगी भर को उर्मिला माधव 24.1.2018

बहाना चाहती हूँ

सिर्फ़ हंसने को बहाना चाहती हूँ, मैं कहाँ सबको हंसाना चाहती हूँ, गर उमड़ आए समंदर अश्क का, तब मैं तनहाई में जाना चाहती हूँ, ग़ैर के कांधे की तालिब किसलिए, बार अपना ख़ुद उठाना चाहती हूँ, मैंने कब साझा किया है ग़म कहीं, राह अपनी ख़ुद बनाना चाहती हूँ, कोई हँस के बोल ले तो ठीक है, वर्ना घर को लौट जाना चाहती हूँ.. हर हक़ीक़त जानती हूँ दह्र की, इसलिए दामन बचाना चाहती हूँ, उर्मिला माधव Sirf hansne ko bahaana chaahti hoon, main kahaan sab ko hansaana chaahti hoon, gar umaRh aaye samandar ashk ka, tab main tanahaayi mein jaana chaahti hoon, ghair ke kaandhe ki taalib kis liye, baar apna khud uṭhaanaa chaahti hoon, main ne kab saajhaa kiya hai gham kaheen, raah apni khud banaana chaahti hoon, koi hans ke bol le to ṭheek hai, varna ghar ko lauṭ jaana chaahti hoon..  Har haqeeqat jaanti hoon dahr ki, is liye daaman bachaana chaahti hoon, -Urmila Madhav

तुम भी हो जाओ

जाओ मगरूर तुम भी हो जाओ, जाओ और दूर तुम भी हो जाओ, मुफ़्त हलकान जैसे रहते हो, जाओ मशहूर तुम भी हो जाओ, इसमें क्या-क्या मज़ा है,देखोगे?  जाओ मजबूर तुम भी हो जाओ, तुमको दिल से दुआएं देती हूँ , जाओ रंजूर तुम भी हो जाओ, कर लो जिससे निबाह होता है, जाओ मशकूर तुम भी हो जाओ.... #Urmila 22.1.2015....

लाए क्यों

दिल की खारिश को जुबां पर लाये क्यूँ ? जी नहीं था तो यहाँ तक आये क्यूँ  बस तुम्हारी ख़ुद ख़याली है अज़ाब, आ ही पहुंचे हो तो फिर पछताए क्यूँ ?  क्यों कोई मानेगा तुमको नाख़ुदा, जान कर ये धोखे तुमने खाए क्यूँ?? कामयाबी नर्म लहज़े की गुलाम, इस क़दर तेवर भला दिखलाए क्यूँ, खुद-ब-खुद अपना रवैय्या लो बदल, अब ज़माना ही तुम्हें समझाए क्यूँ  उर्मिला माधव... 21.1.2015 #उर्मिलामाधव

ज़लज़ले के बाद

आंखें ठहर गईं हैं सहर देखने के बाद, जुम्बिश कहाँ करेंगी किसी ज़लज़ले के बाद, काविश हमारी देख ले हम उम्र भर चले, फिर उठ खड़े हए हैं नए मसअले के बाद हमको पुकारना है ग़लत, हम तो रुक गए, दम तोड़ के खड़े हैं किसी वसवसे के बाद, जो हो चुका है उसके तईं, ग़म भी क्या करें, ये फ़ैसला किया है हर इक हादिसे के बाद, उर्मिला माधव

ग़म करना

हमको आता कहाँ है ग़म करना, अपनी वीरानियों को कम करना, जो भी सीखा सो सिर्फ़ ये है बस, आंख को आंसुओं से नम करना, ये भी दुनियां का एक जलवा है, अपनी गर्दन को कैसे ख़म करना, ये भी इक ज़ाविया है दुनियां का एक ही पल में मैं को हम करना उर्मिला माधव

ये वक़्त वो नहीं कि जिसे

ये वक़्त वो नहीं कि जिसे फिर पुकार लें, अब ज़िन्दगी जहां है वहीं पर गुज़ार लें. दुनिया से रस्म राह किसे हो सकी नसीब, हिम्मत जुटा रहे हैं कभी,  ख़ुद से हार लें.. उर्मिला माधव

kalam kiya jaae

उसका सर भी कलम किया जाए, जिसको रह-रह के ग़म दिया जाए, गर तगाफुल में रंग भरना हो,  सिर्फ़ गर्दन को ख़म किया जाये, जीते जी मारना है उसको गर, उसपे चर्चा भी कम किया जाए, #उर्मिलामाधव... 18.1.2016

pyar ka jaam

प्यार का जाम पियो,गर जो पिला दे कोई, इतना एहसास रहे......ग़म न बढ़ा दे कोई... ख़ुद पस-ए-पर्दा रहो, धूल बहुत उड़ती है, अपनी ठोकर से कहीं ख़ाक उड़ा दे कोई, सांस तरतीब से आ जाये के इतना तो रहे, दर्द क्या कम है के कुछ और हवा दे कोई, उर्मिला माधव.. 18.1.2017

ग़म साधे तक

हम तो कितनी बार गए हैं, उसके घर के दरवाज़े तक, वो ही कभी न आया फिर के अपने किये हुए वादे तक.. दर्द में पिन्हा होकर भी बस खामोशी से देखा सब कुछ, ख़ुद को हमने क़सम दिलाई, नहीं टूटना ग़म साधे तक.. उर्मिला माधव

रंग

हम जो मरते तो बड़ी दूर तक मरते, शह्र के शोर में हर रंग उभर आता है.. उर्मिला माधव
शाम तो अब हो गई घर दूर बहुत है

चिलमन दरूं गिरा के किया आपने गुनाह

चिलमन दरूं गिरा के किया आपने गुनाह, इस बे-अदब अदा का भला क्या करेंगे आह !!, इन फासलों के साथ ही चलना है गर हमें, किसकी करेंगे आरज़ू,किसकी तकेंगे राह, करने से पहले आपने सोचा तो होगा खूब, हरक़त को आफरीं है,अदावत की वाह-वाह !! इसके हुए मआनी के उल्फत हुयी तमाम, अब देखनी है आपकी बदली हुयी निगाह, हमको किया अमीर भी इफरात से जनाब, रख्खेंगे अब सहेज के ये आह और कराह,  उर्मिला माधव... 11.1.2014..

ये व्यथा कथा और अंतर्मन

ये व्यथा कथा और अंतर्मन, अब बीत गया पूरा जीवन, जब मार्ग सतत हम चलते हैं, तब स्वयं स्वयम को छलते हैं, भ्रम जाल समझ सब आते हैं, हम फिर भी धंसते जाते हैं, परिचर्या जीवन शैली की, जीवन भर समझ न पाते हैं, उर्मिला माधव..

tu bhi nahin

Main agar mazboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabishtaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin BewafaiI ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach yahi hai ke bahut , bezaar to tu bhi nahin.... Urmila Madhav..

ताज़िरते हिन्द की तस्वीर

अब ताज़िराते हिन्द की तस्वीर देखिये,  हर ज़ाविये से मिट रही तक़दीर देखिये.. कुछ ठीकरों में बेचता इंसान अपने ख़ाब, चलती कहाँ है कोई भी तदबीर देखिये.. उफ़ गर्द में निहां है यहाँ आदमी की ज़ात,  हर पाँव अब हुआ है यूँ ज़ंजीर देखिये.. रहजन हों सलातीन तो बुनियाद भी है ख़ाक लुटती हुई वतन की ये जागीर देखिये.. औक़ात अब बशर की कहाँ कोई है जनाब ,  कुछ शोहदों के हाथ में शमशीर देखिये...  उर्मिला माधव....
हाकिम की भूल-- नए वक़्त ने लगभग सभी को मोबाइल इस्तेमाल करना सिखा दिया था सो भोला सरकार एक बड़े ऑफ़िसर के मातहत थे और उनके पास भी मोबाइल था, जो उनकी आगे की जेब में से अक्सर झांकता रहता था,जिस ऑफ़िसर के यहां वे मातहत थे वो थे तो बड़े नेकदिल इंसान पर कभी-कभी उनका मिज़ाज अचानक ही बहुत उखड़ जाया करता था और उस वक़्त उनकी नेकदिली जाने कहाँ हवा हो जाती थी, किसी के भारी से भारी नुकसान की परवाह नहीं किया करते थे जबकि आदतन  वो सबका भला ही चाहते थे..                        एक दिन भोला सरकार अपनी बीमार बीवी को घर पर छोड़ कर आये थे अपने हाकिम से छुट्टी की दरख़्वास्त के लिए बात करना ही चाहते थे कि पता चला आज उनके हाकिम का मिज़ाज बिगड़ा हुआ था और वो बड़े परेशान थे कि कैसे छुट्टी की दरख़्वास्त करें, पर फ़िर भी कहना तो था ही क्यूंकि उनकी पत्नि सेहतमंद नहीं थीं वो हाकिम के सामने पहुंचे ,कुछ कहते तभी अचानक उनका मोबाइल बज उठा और वो एक तरफ जाकर उसको कान पर लगा कर सुनने लगे, बेटी की आवाज़ घबराई हुई थी और वह कह र...

दर्द आहों में

ग़ज़ब दीवानगी है ये,मुहब्बत की पनाहों में, छलकने ही नहीं पाया ज़रा भी दर्द आहों में. बहुत रूपोश रख्खा था ज़माने भर की नज़रों से, जो दिल में दर्द रहता था उभर आया निगाहों में, हम अपना हाथ पेशानी पे रख के सोचते हैं अब, ज़माना हो गया हमको गए, दिलबर की बांहों में उर्मिला माधव

रौब दाब से

उसने सजाया ख़ुद को बड़े रौब दाब दे, आंखें उठाके मिलने चले आफ़ताब से. उर्मिला माधव

इक नंबर रहे

हम हमेशा वक़्त की सरहद पर इक नंबर रहे, दिल डरा करता था लेकिन हम वहीं जाकर रहे. इतनी सारी सरहदें दीवार बन कर साथ थीं क्या बताएं किस लिए हम उम्र भर बे घर रहे. बज़्म की रंगीनियां भी रु ब रु होती रहीं, हम मगर दानिशवरों की भीड़ में हटकर रहे. उर्मिला माधव