ये उठते हुए ग़ुबार
ये उठते हुए ग़ुबार दिल में,
थका देते हैं,
पाँव बंध जाते हैं,
आहटें थका देती हैं
कानों को,
ख़त्म होती हुई जिंदगियां,
रुला देती हैं आंखों को,
गर्द में मिला देती है
ज़मीन आंसुओं को,
बवंडरों के झोंके हिला जाते हैं
रूह को,
भूल गया दिमाग़, चौकन्ना होना,
सो जाना चाहता है
सब भूल कर,
रब भूल कर,
वही सच देखने को बेचैन दिल
जो दिखाई नहीं देता,
सुनाई देता है,
धुन्ध के ग़ुबार इनमें चरमराते हुए
सूखे पत्ते,
खौलते हुए एहसास ,
दबी हुई आहें,
सांप के फन की तरह उठ खड़ी होती हैं,
हम इन से डरके बचाते हैं
ख़ुद को,
पर डसते हैं इतनी तेजी से,
सांस जाने की ख़बर नहीं होती,
हम फंसे रह जाते हैं उनमें
उलझ जाते हैं,
ज़िन्दगी भर को
उर्मिला माधव
24.1.2018
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