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Showing posts from August, 2021

कासा नहीं रखती

ज़रूरतमंद हूँ लेकिन कोई कासा नही रखती, इरादा जो भी रखती हूं कभी आधा नहीं रखती, मेरी आवाज़ का हिस्सा फ़लक तक भी पहुंचता है, जो कहती हूँ बुलंदी से,ज़ुबाँ सादा नहीं रखती, मेरे खूँ में तो नाफ़रमानियाँ, शामिल नहीं हरगिज़, मगर इल्ज़ाम है सर पर, के ये वादा नहीं रखती, अभी कुछ ज़ख़्म रिसते हैं,अभी कुछ वक्त बाक़ी है, ये ग़म बहने का ज़रिया हैं तो मैं फ़ाहा नहीं रखती, मुझे भी क़ब्र तक ले जाएगी बादे सबा इक दिन इसी डर से मैं अपनी रूह पे साया नहीं रखती उर्मिला माधव, 30.8.2017

बहला करूँ

किसलिए जज़्बात का सौदा करूँ, झूठ से भी कब तलक बहला करूँ, जो मेरी बुनियाद का हिस्सा नही, उसपे नीयत किस लिए ज़ाया करूँ,   यूँ भी तो तनहा है हर इक आदमी, बे-सबब ही इतना क्यूँ सोचा करूँ, कौन किसका हो सका है उम्र भर, कौन से हक से भला दावा करूँ, कोई भी हो,गम ही दे कर जाएगा, जानके ग़म किसलिए चस्पां करूँ   जब अनल हक़ पै टिकी है ज़िन्दगी, दर-ब-दर फिर किसलिए घूमा करूँ....  उर्मिला माधव .... 28.8.2017
शाम का अक्स ज़िंदगानी है लगता रहता है, सुब्ह आनी है आदमी सिर्फ़ इक मुसाफ़िर है एक इक सांस इसमें फ़ानी है कोई मंज़िल नज़र नहीं आती, फिर भी इक राह तो बनानी है कितना मरने प हम हैं आमादा, अपनी शिद्दत भी आज़मानी है अपने हाथों लहद सजानी है

भर आएं

जितनी भरनी हों आँखे भर आयें इतनी ज्यादा कि दरिया कर जायें , चाहे मरने जीने पे बात जा पहुंचे , गैर मुमकिन है उनके घर जाएँ , जितने दावे किये हैं बढ़-बढ़ के , आज साबित वो आके कर जाएँ, हैं परेशान वो अगर मेरी तरहा, घर से निकले तो बस इधर आयें, जो मुहब्बत की रहगुज़र मैं हैं , उनको वाजिब नहीं कि डर जाएँ... !! ............उर्मिला माधव............. २३.८.२०१३

ग़ौर से

एक मतला तीन शेर--- उसने कल चेहरे को देखा गौर से, मुझको हैरत सी हुई इस तौर से, रुख़ पै माज़ी की लिखी है हर लकीर, वक़्त ये गुज़रा है जिस-जिस दौर से, उसको अपना जानके बांटा था ग़म,  कौन कहता है वगरना और से, इससे पहले ये हिले बुनियाद भी, तर्क करना है त-आल्लुक ठौर से... #उर्मिलामाधव... 23.8.2015...

बहुत ख़ाली सड़क

एक बहुत ख़ाली सड़क प आंख से ज़्यादा नहीं, इक ज़ुबाँ ख़ामोश हर पल चीख से लड़ती हुई, इक अजब वहशत सी तारी सोज़-ए-पिन्हानी में ग़र्क़,  पर कभी देखा नहीं उस ज़र्द पेशानी पे दर्द चार सू खामोशियों का शोर सा उठता हुआ, एक तन्हा दिल ग़मों की भीड़ से लड़ता हुआ, कितनी लंबी चुप्पियों का हौसला रखते हुए, लब तबस्सुम का मुलम्मा ख़ूबियों से ओढ़ कर, ख़ुद ब ख़ुद ही अपने हाथों,अपने दिल को तोड़ कर, रोज़ उसको आते-जाते देखते रहना है  बस .... उर्मिला माधव, 23.8.2017

दिल सख़्त होना चाहिए

चोट खाने के लिए दिल सख्त होना चाहिए,  ख़ुद संभलने के लिए कुछ वक़्त होना चाहिए, बात ग़र कहनी रहे तो हौसला रख्खें ज़रूर, हक़ बुलंदी के लिए बस ख़ब्त होना चाहिए, एक दिन का काम तो ये है नहीं सुनिए जनाब, इस हुनर में बा-अदब बा रफ्त होना चाहिए, चाल अपनी,ढंग अपना,रंग भी अपना रखें, बद-गुमानी नईं रखें,ये ज़ब्त होना चाहिए, चाहे अनचाहे हज़ारों लानतें मिल जायेंगी, दह्र की नज़रों में बस कमबख्त़ होना चाहिए, उर्मिला माधव... 22.8.2014...

दामन ए दश्त से बाहर

दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे, बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे? आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत, सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे? रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है, है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे, लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल, सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे, आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या, ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे, अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ? देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे... उर्मिला माधव.... 22.8.2016

आइयाँ हुन बरसातां ने

कभी एकाध बार पंजाबी में कहने की कोशिश की  जिसमें इस्लाह तरकश की रही..  :) आइयाँ हुन बरसातां ने, माए लम्मीआं रातां ने, जिंद कटे ना हंजुआं नाल, विच कलेजे मचे धमाल किसे नूं दसना वी नईं हाल, सारीआं लुकीआं बातां ने,  माए लम्मीआं रातां ने, बिन गल्लो एह तणदा सी, गल्ल मेरी ना सुणदा सी, राह दा रोड़ा बणदा सी रब्बा लुकीआं घातां ने.... माए लम्मीआं रातां ने, उर्मिला माधव  22.8.2017

दामन ए दश्त से बाहर

दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे, बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे? आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत, सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे? रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है, है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे, लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल, सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे, आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या, ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे, अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ? देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे... उर्मिला माधव.... 22.8.2016

हक़ीक़त बता दूं ?

बड़ी बेखबर हूँ, हक़ीक़त बता दूं, तुझे ज़िन्दगी अब कहाँ से सदा दूँ, चमकती है बिजली सी ख़ामोशियों में, अभी मैं भला कैसे घर को सजा दूँ बहुत उम्र गुज़री अजब तीरगी में, ये जी चाहता है कि दामन जला दूँ, यहां मेरा अंदाज़ सब से जुदा है, तो अंदाज तुझको नई क्या हवा दूँ, तबीयत भी अंदर से कहने लगी है जो हैं तीर खंजर वो सारे चला दूँ, कभी मैंने दिल की सुनी ही कहाँ है, जहान-ए-ज़ेहन को कहां तक दगा दूँ, उर्मिला माधव
विरले ही होते हैं जग में धर्म युद्ध के अधिकारी जीवन मरण सभी होते हैं उस प्रबुद्ध के बलिहारी।।

सितम हो रहा है

मेरे दिल पै कबसे सितम हो रहा है, के अब सब्र मेरा भी कम हो रहा है, लो आँखें बरसने-बरसने को आयीं, ये दिल भी अजब है कि नम हो रहा है, ये जी चाहता है कि मैं ख़ुद पै हंस लूँ, खुदा से भी बढ़के सनम हो रहा है, बहुत झुक गया है मेरा सर ज़मीं पर, कि घर मेरा दैर-ओ-हरम हो रहा है, तो साँसों का रुकना भी है तय शुदा ही  लो अब एड़ियों में ही दम हो रहा है.... #उर्मिलामाधव... 20.11.2014....

ख़ुद करेंगे

अपने घर में रौशनी हम ख़ुद करेंगे, ज़िन्दगी को ज़िन्दगी हम ख़ुद करेंगे। किसलिए मायूस होगी रूह अपनी, तीरगी से आशिक़ी हम ख़ुद करेंगे।

दिलनवाज़ों से रहेगी

ख़ास दूरी, दिल नवाज़ों से रहेगी, दोस्ती अब बे-नियाज़ों से रहेगी, लफ़्ज़ ही तो दिल हमेशा तोड़ते हैं, अब मुहब्बत सिर्फ़ साज़ों से रहेगी, सादगी में ज़ुल्म के किस्से बहुत हैं, बरहमी क्या ख़ाक बाज़ों से रहेगी, जो भी हमको चाहिए वो आपसे क्यूं, सारी हसरत कारसाज़ों से रहेगी, ये बुलंदी और ख़ुदी जो भी है यारब, ज़िन्दगी के साथ नाज़ों से रहेगी, उर्मिला माधव 10.8.2019

क्या क्या न गुज़री मतला

एक मतला------ चले जाने वाले,तुझे क्या खबर है,मेरे दिल की दुनियां पे क्या-क्या,न गुज़री, कमानें,कटारी,ये खंजर ओ नेजे,हर इक जा अदावत की दुनियां है बिखरी, #उर्मिलामाधव... 4.8.2015...

आसान थे

देख लीजै हम बहुत आसान थे आप ही तो बस हमारी जान थे, आप के बदले इरादे देख कर, हक़बकाए से बहुत हलकान थे, बात का आख़िर हुआ लुब्बे लुवाब, वो समझ बैठे के हम नादान थे, हम भी अपनी ज़ात के यक़ता हैं बस, ख़ास कुछ तेवर हमारी शान थे, जिन हदों तक हम पहुंच सकते थे तब, उन हदों से आप भी अनजान थे, उर्मिला माधव 4.8.2019

नज़्म---एक सहेली

मुस्कुराते लब और आँखें गीली लेकर आ गई, एक सहेली,चार दिन में,इश्क़ से घबरा गई, ज़ोर से हंसती थी और आँखों को पोंछे जा रही, और पिछले चार दिन की दास्ताँ बतला रही, क्या बताऊँ किस तरह वो ,ख़ुद को आक़िल कह गया, और सादा दिल मिरा उस गुफ़्तगू में बह गया, कैसेनोवा दिल से था और ज़ाहिरी सूरत ज़हीन, मुत्मईं था कुछ भी कर सकती है ये शक़्ल-ए-हसीन, लफ्ज़ शीरीं और ख़ुद भी था बहुत शीरीं मिज़ाज, बाद उसके क्या हुआ बस वो मैं बतलाती हूँ आज, धीरे-धीरे घूम फिर कर इश्क़ सा फ़रमा गया, यूं समझ लो अय सहेली मुझको भी भरमा गया, ख़ैर अपनी ज़ात से वो बाज़ आता भी तो क्यों, तोड़ डाला दिल को मेरे,पास आता भी तो क्यों, तब अचानक एक दिन आया मगर तनहा नहीं, दिल परेशां हो गया मैं क्या करूँ और क्या नहीं, बेवफ़ाई देखकर दिल जब बहुत बेबस हुआ, सिर्फ़ हंसती ही रही मैं जितना मेरा बस हुआ, बस वही था आख़री लमहा उसे सोचा था जब, मन को यूँ समझा लिया के वो बता,तेरा था कब, हद से ऊपर हो गया तो सब मिटा कर आ गई, और हुजूमे ग़म से मैं दामन छुड़ा कर आ गई.... उर्मिला माधव, 3.8.2016