नज़्म---एक सहेली
मुस्कुराते लब और आँखें गीली लेकर आ गई,
एक सहेली,चार दिन में,इश्क़ से घबरा गई,
ज़ोर से हंसती थी और आँखों को पोंछे जा रही,
और पिछले चार दिन की दास्ताँ बतला रही,
क्या बताऊँ किस तरह वो ,ख़ुद को आक़िल
कह गया,
और सादा दिल मिरा उस गुफ़्तगू में बह गया,
कैसेनोवा दिल से था और ज़ाहिरी सूरत ज़हीन,
मुत्मईं था कुछ भी कर सकती है ये शक़्ल-ए-हसीन,
लफ्ज़ शीरीं और ख़ुद भी था बहुत शीरीं मिज़ाज,
बाद उसके क्या हुआ बस वो मैं बतलाती हूँ आज,
धीरे-धीरे घूम फिर कर इश्क़ सा फ़रमा गया,
यूं समझ लो अय सहेली मुझको भी भरमा गया,
ख़ैर अपनी ज़ात से वो बाज़ आता भी तो क्यों,
तोड़ डाला दिल को मेरे,पास आता भी तो क्यों,
तब अचानक एक दिन आया मगर तनहा नहीं,
दिल परेशां हो गया मैं क्या करूँ और क्या नहीं,
बेवफ़ाई देखकर दिल जब बहुत बेबस हुआ,
सिर्फ़ हंसती ही रही मैं जितना मेरा बस हुआ,
बस वही था आख़री लमहा उसे सोचा था जब,
मन को यूँ समझा लिया के वो बता,तेरा था कब,
हद से ऊपर हो गया तो सब मिटा कर आ गई,
और हुजूमे ग़म से मैं दामन छुड़ा कर आ गई....
उर्मिला माधव,
3.8.2016
Comments
Post a Comment